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मरजाणी दा मान (पूरी कहानी)
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बेवतनी मुझे विरासत में मिली थी।
दादजी सैंतालीस में कसूर छोड़ कर भागे थे। कहाँ जायेंगे, नहीं पता था। गुढ़ा-केमला आकार रुके। कसूर लाहौर से कोई चालीस मील है। कसूरी मेथी में वही कसूर का क़स्बा है। बड़े गुलाम अली खान भी

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Father!

Father!!!
- I was reading this heart touching story and wish to share.

One day an 11 year old girl asked her dad, “What are you going to get me for my 15th Birthday?” The father replied, “There Is Much Time Left.”

When the girl was 14 she fainted and

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एक बेटा ऐसा भी

 

"एक बेटा ऐसा भी"

• "माँ, मुझे कुछ महीने के लिये विदेश जाना पड़ रहा है। तेरे रहने का इन्तजाम मैंने करा दिया है।" तक़रीबन ३२ साल के, अविवाहित डॉक्टर सुदीप ने देर रात घर में घुसते ही कहा।

• "बेटा, तेरा विदेश जाना ज़रूरी है क्या?" माँ की आवाज़ में चिन्ता औ

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मेरे_पापा_की_औकात

मेरे_पापा_की_औकात
पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे।
अंदर प्रवेश किया तो छोटे से गैराज में चमचमाती गाड़ी खड़ी थी स्विफ्ट डिजायर!

मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमा

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पिता का पुत्र के नाम पत्र

लखनऊ के एक उच्चवर्गीय बूढ़े पिता ने अपने पुत्रों के नाम एक चिट्ठी लिखकर खुद को गोली मार ली। चिट्टी क्यों लिखी और क्या लिखा। यह जानने से पहले संक्षेप में चिट्टी लिखने की पृष्ठभूमि जान लेना जरूरी है।

पिता सेना में कर्नल के पद

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कबाड़


दिवाकर बाबू घर के दोमंजिलें पर बने अपने कमरे में एकदम गुमसुम बैठे थे। चंद्रकला का जब से निधन हुआ है जैसे वह किसी बीहड़ जंगल में भटक रहे हों। जब तक वह जीवित थी कितना ख्याल रखती थी। समय पर दवाई...समय पर खाना...फुरसत के क्षणों में हंसते बतियाते समय कब बी

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माँ बीमार है

माँ बीमार है
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हम दोनों एक धूप के तले थे, जैसे दो जन एक ही छाया में होते हैं। मुझे लगा अप्रैल की इस धूप ने हमें अपनी किरणों से बांधा हुआ है।
मैं उसे तीन दिन से देख रहा था। वह छत पर बंधी अरगनी पर कपड़े सुखाती थी, गली के उस पार अपनी तीन ओर से ऊंची

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दो कहानियाँ


1.
एक बड़ा पेचीदा सा अजीब सा मसला सामने आया था .

मेरे एक जानने वाले हैं
मात्र 42 की उम्र थी उनकी जब उनकी पत्नी का देहांत हो गया ...

बेटा 16 का और बेटी 14 की ...
सौतेली माँ के नाम से आतंकित भाई साहब ने शादी ना करने का फैसला किया साथ ही बोले कि

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कहानी

ज़िंदादिल....

उस्ताद प्रोफेसर..मुजतबा हुसैन,
महफ़िलों के ग़ुरूर का बाइस,अदब की दुनियां के नामी गरामी शायर, oxford यूनिवर्सिटी में ज़बान के प्रोफ़ेसर,( professor de lingua) आगरा के बाशिंदे थे,इतने ख़ूबसूरत के जहां से भी गुज़र जाते थे हर ख़ास-ओ-आम को मुतास्सिर क

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लिछ्मी का हाथ

लिछ्मी का हाथ
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लिछ्मी कतई मानने को तैयार नहीं थी।
" नहीं शंभू, नहीं ! तेरा मन करे तो यहाँ आ जाया कर। नहीं तो कोई बात नहीं। अब इन हाथों में जान नहीं है रे!"
सबूत के लिए उसने अपना दायां हाथ शंभू के आगे कर दिया, और उसका सिर ना में हिलता रहा।
शं

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एक लघुकथा: अस्थिचर्ममय
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पिछले हफ्ते एक फ़ेसबुक मित्र ने मेरे संदेश बॉक्स में अपनी एक लघुकथा भेजी, संदेश के साथ।
संदेश था- मान्यवर आपकी कहानियाँ अच्छी होती हैं, मगर आप उनमें हिन्दी ज़्यादा लिखते हैं, पढ़ने में कठिनाई होती है, पर आप

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फालतू चंदगी की अमर कहानी
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उन दिनों हर गाँव में कई चंदगी होते थे। इसलिए ज़रूरी था कि हर चंदगी की अपनी अनन्य पहचान हो, मसलन, दांतला चंदगी, काबा चंदगी इत्यादि। काबा, तोतला नहीं, उसका समीपवर्ती होता है। हमारा चंदगी फालतू चंदगी था।
चं

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गिर गया चाँद

गिर गया चाँद
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रधिया ने भी वैसे प्यार ही किया था। प्यार के पोखर में भी दलदल होती है यह तब समझ आया जब पेट से हुई और जगिया को बताया। थप्पड़ सा जवाब मिला, " चल बे रंडी कहीं की!"
यह तो मीनाताई ने दुनिया देखी थी जो रंडी शब्द का सही अर्थ समझाने की ब

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मूँछों वाली औरत

मूँछों वाली औरत
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इब्राहिम देमिर के चेहरे की इबारत पुरानी किताब की तरह बड़ी और स्पष्ट थी। मैं देखते ही पहचान गया, इब्राहिम ही है।
" इब्राहिम, हबीबी...इतने साल बाद!" मेरी गर्मजोशी का ठिकाना नहीं था।
उसकी मुस्कान झुरियों में छुप गयी थी, या शाय

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ज़िन्दा होने की कोशिश
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उसे किसी के साथ की भी ज़रूरत नहीं है, प्यार को तो रहने ही दीजिए। यही लगता था, गोंडवाना क्लब के जहाज़ी रेस्तरां की चार जन की टेबल पर रोज़ाना उसे अकेले बैठे देख कर। प्यार का ज़िक्र इसलिए कि कुछ चेहरे ही एंटीलव होते

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बाबू गौतम

ला मादरे वेस्टिदा
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वह मेरा पेइंग गेस्ट था। किराए वाले रूम की एंट्री अलग से थी, इसलिए मैंने हमेशा अकेले मर्दों को किरायेदार रखा। कोई झंझट नहीं रहता। आदमी अपने काम पर गया तो गया, पीछे से बाई कमरा झाड़ पोंछ देती थी। सुबह का नाश्त

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कहानी

कहानी- अनन्त आकाश


मेरे देखते ही बना था ये घोंसला, मेरे आँगन में आम के पेड पर- चिड़िया कितनी खुश रहती थी और चिड़ा तो हर वक्त जैसे उस पर जां-निसार हुआ जाता था। कितना प्यार था दोनो मे! जब भी वो इकट्ठे बैठते, मैं उन को गौर से देखती और उनकी चीं-चीं से बात, उ
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लगा मेरे बाएँ पैर की अंगुलियों पर ज़ोर से हथौड़ा मारा है किसी ने। मेरी चीख निकल गयी। मन में चल रहा स्वप्निल दृश्य झटके से टूट गया। कोई आदमी होता तो सीधा धक्का मारता। एक अधेड़ औरत ने अपने बोरी में लिपटा पत्थर धम्म से मेरे पैर पर रख दिया था। नारनौल अड्

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कल 90 वर्षीय शादीलाल जी वॉयलेट लाइन मेट्रो में अकेले सफर करते मिले। सीनियर सिटीजन की सीट पर उनके बगल में बैठने के बाद मुझे लगा वो कुछ बेचैन हैं।
बार बार वे मुझसे पूछते ये कौन सा स्टेशन है?
जब मैंने पूछा कि आपको जाना कहाँ है तो वो माथे पर हाथ रख कर बो

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गुंजाइश

गुंजाइश
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ग्रॉसवेनर हाउस का अपना एक राजसिक इतिहास है। ग्रोसवेनर्स फॅमिली यानि ड्यूकस् ऑफ़ वेस्टमिन्स्टर का निवास था कभी। इंग्लॅण्ड के राजे रानियों की कई कहानियों का गवाह है, ग्रॉसवेनर हाउस। वैसे भी पार्क स्ट्रीट के ऊपर से हाइड पार्क का हरा भरा नज़

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