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मज़दूर

मज़दूर


खाली कारखानों में
सामान छोड़ जाते हो
तुम भी कोई
शहतूत हो क्या
जहाँ गिरते हो
निशान छोड़ जाते हो।
तुम्हारे दम से रोशन हैं
सुबह की रौनकें सभी
तुम्हारे श्रम से भीगती
शाम गहराती है
जाने कौन रूठा है तुमसे
जाने किस का श्राप है
खाली खाली जमीं और
आसमान

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अब तो जागो

सारे समीकरण 

उल्टे हो गए 

सारे शास्त्र झूठे

मुक्ति का द्वार

उन्मुक्तता

मुक्त हो जाओ

सपनों से, आकांक्षाओं से

इच्छाओं से

माँगों से... मुक्त

केवल मुक्तता ही

मुक्ति का द्वार है!

विचारों को मुक्त करो 

मन को समझने दो

आकाश की उन्मुक्तता

अदृश्य की अपारता

समझो उस पुकार को

अन

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कुछ सहमे कुछ गूँगे

कुछ सहमे कुछ गूँगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ

कवि हूँ मेरे भाव कभी
आँसू की राह निकलते है
और कभी कविता की सीपी में
मोती सा पलते हैं
अपनी अभिलाषाओं की चादर में
छुप कर रोता हूँ
कुछ सहमे कुछ गूँगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ


आज लेखनी थकी हुई
कुछ कहने को आतुर भी

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मदिरा सवैया


कान्ह कहें सुन मात हमें अब, ग्वाल सखा बुलवाय रहे,
भोर हुई कहते हम से चल, माखन दूध पिलाय रहे।
हेरत घेरत बात सुने मत, खींच करें समझाय रहे,
नेह करें सब ग्वाल मुझे पुनि, आकर हाथ मिलाय रहे।


सावन में मत शोर करो घन, प्रीत हिया सरसाय रहे,
याद दिला मत साजन क

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मदिरा सवैया


रंग गुलाल उड़े हर ओर अबीर सजा कर माथ पिया,
ढोल बजा कर ताल सजाकर फागुन गीत सुनाय हिया,
पावन प्रीत करे मनमीत पिला लव आसव मस्त किया,
खूब करे हुड़दंग मिले जब अंग हिया पट खोल दिया।

दृश्य बड़ा अभिराम घिरे घन याम घटा अति रोर करे,
चाँद घिरा घन बीच धरा तम भींच

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सुनो
तुम्हें पता है
जब तुम गहरी नींद की
बेख्याली में
कुनमुनाते हो
जाने क्यों करवट सी
बदलते बस यूं ही
मेरे सीने से लिपट जाते हो
तो
कितने प्यारे लगते हो..
वो उस दिन
हल्की सी बुंदिया में
भीगते सुस्ताते
आधी नींद आधी तन्द्रा
आधी झपकी में
बतियाते
मेरे ही

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गीत

जो उड़ना है तुझे ऊंचा परों को खोल के रख।
कसौटी वक्त की है हौसलों को तोल के रख।।

अभी आग़ाज़ है तेरा बहुत कुछ सीखना है।
कमर कसनी अभी बाकी है मुट्ठी भींचना है।
भले हालात हों कैसे भी बस ये सोच ले तू।
यही ज़िद है यही है रार बस अब जीतना है।

लिखूँगा खुद नई तकदीर अपने

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उठो धनुर्धर! (गीत)

उठो धनुर्धर! बैठ गए क्यों?
उठो पार्थ! क्यों बैठ गए हो?
रण तो पूरा बचा हुआ है।

समर भूमि में वीर तुम्हारे,
मन में अंतर्द्वंद चल रहा।
भाव-हृदय से टकराए हैं,
नयन नीर विष्यन्द चल रहा।

उठो! तुरत गांडीव उठाओ, वीर! हार मत मानो तुम।
समर शेष को पूर्ण करो, यदि; रग में

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ये हिज्र है ना विसाल है
बस मुहब्बतों का ज़वाल है
तुझे चाहता है कोई आज भी
बस उन्ही चाहतों का सवाल है

तुझे देख ले जो कोई शब ओ सहर
तेरी इनायतों के हो पेशतर
ये जो गुलों की हैं खुशबुएँ
तेरे संदली हुस्न की मिसाल हैं

ये खूबसूरत वादियां
ये परिंदो की शादियां
तेर

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तुम सूर्य हो...


प्रचंडता प्रखरता प्रकाश
का प्रसार हो
कुछ यूं करो के
सब तरफ
आस का संचार हो
हाँ तुम्हीं बस तुम्हीं हो
एक अखण्ड सूर्य
तुम्हारी रश्मियाँ गिरें तो
जीवंतता विस्तार हो
मिलो कभी विश्वास से
प्रेम से उत्साह से
भूल कर सभी सवाल
संदेह और विवाद को
आलोक का बनो स्

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कुछ यूं ही.....

कुछ लम्हे बोए हैं मैंने

बस यहीं
इसी जगह...
कुछ हँसी के
कुछ रुलाई के
कुछ प्यार भरे
कुछ बेवफाई के
एक कलम भी बोई है
दिल के कठगुलाब की
एक बिरवा भी है
दोस्ती की तुलसी का
सच कहूं
उम्मीद नहीं ज़िद है
खरपतवार हटाना है
हर पौधे को
लहलहाना है
फूल कलि

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मौन है...

तरस रही हैं
बाहें
अधरों का मधुमास
मौन है
रुका रुका सा है दर्द
आँखों का सैलाब
मौन है
तुम आ क्यों नहीं जाते
सारी बहार
मौन है
सुनो कुछ
कहना है तुम से
बातों का संवाद
मौन है
कभी तो जलोगे
तुम भी
कभी तो रंग लाएगी
हिना
प्रतीक्षारत तन मन की
हर प्यास
मौन है..

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प्रतिक्षाएँ

प्रतिक्षाएँ
मौन हुआ करती हैं
खण्डहर सी वीरान भी
मौन सी निस्तब्ध भी
परन्तु
यह प्रतीक्षा कुछ अजीब थी
किसी नई किताब सी
जिसका पहला पृष्ठ खुला
और
वहीं कोने में छूट गया
शाम को बिस्तर पर
औंधा पड़ा
बस वहीं छूट गया।
पता नहीं कब
वक्त उठ कर
आगे चला गया
सदियों की

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कुछ तुम से....

कुछ कहना था तुम से
वो हर बार
तुम्हारे दरवाज़े के
आगे से निकलते हुए
उस बड़े से ताले को
देखा था तो...
तुम्हें याद किया था।
वो उस दिन
किसी पुरानी सहेली ने
पिछली गली में छूटी
तुम्हारी बातों को
दोहराया था तो...
तुम्हें याद किया था।
यूँ ही चलते चलते
रोज को

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कविता

भौतिकता

कितने अच्छे थे वो लम्हे जब सपने छोटे होते थे ;

छोटी खुशियाँ, छोटे ग़म थे, हम संग संग हँसते रोते थे ;

आज न जाने कैसे सपने देख रहे हैं नैन हमारे ?

कि नींद उचट जाती रातों में, छिन रहे हैं चैन हमारे ;

इक छोटे से घर का सपना तब्दील हो गया इमारत में,

अमन च

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कविता

अजन्मी बेटी की गुहार
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जीने का अधिकार मुझे दे.....
ओ मेरी मैया, सुन मेरी मैया,
बस थोड़ा सा प्यार मुझे दे.....

माटी से
और रंगों से
ईश्वर मुझको बना रहा है ;
तू भी कर इसमें सहयोग -
वरना मेरे जीवन का
हो न सकेगा संयोग -
तेरे लहू और दूध बिना -
कैसे वि

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कविता

जड़---

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धरती के अन्दर

आँख खोलते ही

वो इठलाती है

बाहें  फैलाती है

और गर्व से

फूल जाती है

कि उस से ही है

पेड का जीवन

पर उसका अपना

वज़ूद क्या है

आसमान से कम

क्या होगा!

बाहें पसारती है

फल फूल पत्तों से

खुद को सजाती

संवारती है

फिर इन्तज़ार करती है

कोई आयेगा उसे स

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प्रेम के वशीभूत

प्रेम के वशीभूत
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तुम्हारी यादों में
तुम्हें सोचते हुए
पता न चला
कब आँख लगी
कब ख़्वाबों को पर मिल गये।

अचानक ही
एक स्पर्श हुआ
चिर परिचित
नींद गायब
आँखों में चमक उतर आई ।

मैं तुम्हें चूमने लगा
प्यार करने लगा
आलिंगन बद्ध रहा
कब तक? पता न

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धूल का बिस्तर

मुबारक फ्लैट आलीशान तुमको
मुबारक फ्लैट के वो लग्ज़री कमरे
मुबारक सुर्ख मखमल का शबिस्तां भी तुम्हें
मगर ज़रदार इंसानो
तुम अपने मखमली बिस्तर पे सो जाने से पहले
उसे हाथों से छूकर देखना
महसूस करना, सोचना
ये सच में लाल मखमल है
या उस मुफ़लिस बदन के खून के क़तरे बि

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दरियाओं के संग बहता था,
अपने अंदर खुश रहता था,
हर ग़म को हँस कर सहता था,
गीत, ग़ज़ल नज़्में कहता था।

जैसे हाथों बीच समंदर,
जाने कौन था मेरे अंदर।

आसमान पर नज़र टिका कर,
गहरे पानी भीतर जा कर,
सुख दुख के कुछ मोती पाकर
तन्हाई में नग्में गाकर,

जीता जैसे मस्त कलंदर,
जाने

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