Kishan Swarup's Discussions (4)

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परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ु

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वो मुन्तज़र भी है

वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी
हुआ है वो इन्तिहा ख़फ़ा क्या

जो मेरी सूरत से मुन्क़बिज़

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याद करते भी नहीं और

याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश किसकी है मेरी बस्ती में मालूम नहीं
दफ़्न कर

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