Kishan Swarup's Posts (22)

आईने का मान

आईने का मान रखूँ
चेहरे पर मुस्कान रखूँ

राहगुज़र आसान रखूँ
मंज़िल पर ही ध्यान रखूँ

जग की भूल -भुलैयाँ में
अपनी कुछ पहचान रखूँ

क़र्ज़ अदा करना लाज़िम
क्यों उसका अहसान रखूँ

ख़ुद से यारी की शर्तें
मुश्किल या आसान रखूँ

मंज़िल दूर सफ़़र तनहा
कम से कम सामान रखूँ

पाँव ज़मीं पर टिके रहें
अम्बर का अरमान रखूँ
स्वरूप

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आदमी से आदमी

आदमी से आदमी हैरान है
दोस्तो,ये मुल्क़ हिन्दुस्तान है

ढूँढ़िये उसको कहीं भी ढूँढ़िये
आदमी जो एक बा- ईमान है

आबरू,ग़ैरत,उमींदें और अना
बस हमारे पास ये सामान है

सच कहा,सौगन्ध खाकर सच कहा
न्याय की उम्मीद की,नादान है

आपका कितना असर है या पहुँच
बिक रहा तमगा,कहीं सम्मान है

जो पराई पीर , अपनी-सी लगे
आदमी भी बस वही इन्सान है

न्याय करना है ज़रा मुश्किल स्वरूप
फ़ैसला करना बहुत आसान है

किशन स्वरूप

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ज़िन्दगी में दर्द से नज़रें चुराने के लिए
इक बहाना चाहिए था मुस्कराने के लिए

आप को तुम और तुम को तू कहा,अच्छा लगा
ये शगल भी लाज़िमी था पास आने के लिए

हाँ, वो पहले सी मुहब्बत अब नहीं बाक़ी रही
गुफ़्तगू होती रहे रिश्ता बचाने के लिए

क़ाफ़िले की भीड़ में तनहा रहे तो क्या हुआ
इक जुनूँ लाज़िम था नक़्शे-पा बनाने के लिए

ज़ख़्म है तो दर्द का भी बारहा अहसास हो
और कोई ग़म निहाँ, आँसू बहाने के लिए

दर ब दर होते रहे तो क्या मिलेगा आख़िरश
कर मुहब्बत इस मकाँ को घर बनाने के लिए

वक़्त का क्या,आज है कल भी वही दोहराएगा
हर सुबह लेकिन नयी होगी ज़माने के लिए
स्वरूप

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परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ुश रहने के नाटक की है लाचारी क्या
नज़रें,लोग चुरा गुज़रेंगे, फिर कोई शिकवा मतकर

प्यासा एक समुन्दर जाने कितने दरिया लील गया
तू प्यासा है,एक बूँद की सागर से ,आशा मतकर

कुछतो म॔ज़िलतक जापहुॅचे ख़ुद राही ख़ुद रहबर थे
अपनी मंज़िल अपना रस्ता तयकर ले,सोचा मतकर

तेरे कुछ करने से कितना भला हुआ है औरों का
अगर नहीं ऐसा 'स्वरूप' तो कुछ ऐसा वैसा मतकर
स्वरूप(अगला-पड़ाव)-2005

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वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी
हुआ है वो इन्तिहा ख़फ़ा क्या

जो मेरी सूरत से मुन्क़बिज़ है
है मेरा अपना ही आइना क्या

है एक लमहा गुनह का आलिम
ज़माने-भर को हुयी सज़ा क्या

हुजूम है और तन्हाइयाँ भी
बजूद अपना भी खो गया क्या

किसी तरह साॅस में साॅस आयी
किसीकी लग ही गयी दुआ क्या

चलो यहाँ से कहीं चलें अब
कि आबो-दाना ही उठ गया क्या

हुजूम है रहबरों का इसमें
अभी सलामत है क़ाफ़ला क्या

तुम्हारे हिस्से में दर्द होगा
हमारे हिस्से में और क्या क्या
स्वरूप (मुन्क़बिज़-नाराज़)

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याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश किसकी है मेरी बस्ती में मालूम नहीं
दफ़्न करना है इसे या कि जलाया जाए

जिनकी फ़ित्रत है हरेक बात पै उँगली करना
ऐसे लोगों को ही आईना दिखाया जाए

तुम जो रूठे हो तो लगता है ख़ुदा रूठ गया
तुम ही बतलाओ तुम्हें कैसे मनाया जाए

जिसको मालूम नहीं रस्ता न मंज़िल ए स्वरूप
ऐसे इन्सान को रहबर न बनाया जाए
स्वरूप

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मशहूर क्या हुए कि वो मग़़रूर हो गये
अपनों से और ख़ुद सेबहुत दूर हो गये
 
जो ज़ख़्म दिये आपने रक्खे सम्हाल के 
गुज़रा जो वक़्त आख़िरश नासूर हो गये
 
कोशिश हजार की कि सम्हल जाए ज़िन्दगी 
लेकिन  तन्हा  सफ़र  था सो मंसूर हो गये
 
करता कहाॅ है वक़्त कभी माफ़  किसी को 
मालिक थे कभी  आज वे मज़दूर हो गये
 
हों  आईने  के  रूबरू  आदत  ही नहीं है
हुलिया  बदल के  शक्ल का मजबूर हो गये
 
वो साथ थे तो मंज़िलें  सारी नज़र में थीं
वो क्या  गये  कि  रास्ते  बे-नूर  हो  गये
 
जब से घुसा है गाँव की सरहद में ये शहर
रिश्तों  के  रंग-रूप  ही  बे-नूर  हो  गये
स्वरूप
 
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शम्स था जोकि

शम्स था जोकि सरपर खड़ा होगया
मेरा साया कहीं गुमशुदा होगया

एक रिश्ता था वोभी फ़ना होगया
उसको कुर्सी मिलीतो ख़ुदा होगया

तीरगी का असर इन्तिहा होगया
मेरा साया भी मुझसे जुदा होगया

उसने मेरी हक़ीक़त जता दी मुझे
यूँ लगा वो मिरा आइना होगया

मेरी माँ ने रखा हाथ सर पै मेरे
वो दवा होगया ,इक दुआ होगया

एक शिद्दत से रिश्ता निभाया मगर
ये ज़माना ही अब बेवफ़ा होगया

आगयी मुंसिफ़ी आज किस मोड़पर
हक़-बयानी का जज़्बा सज़ा होगया

वक़्त था, आइना देखते- देखते
कौन था जो मेरा आशना होगया

ए, ख़ुदा मेरी चादर बड़ी कर ज़रा
तेरी रहमत से क़द तो बड़ा होगया
स्वरूप

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जब अंधेरे को

जब अँधेरे को बेहद गुमाँ होगया
एक जुगुनू से आलम रवाँ होगया

लौट आये वहीं, थे जहाँ से चले
उम्र-भर का सफर रायगाँ होगया

हम चले,तुम चले,ये चले,वो चले
एक मंज़िल थी सो कारवाँ होगया

दबगया,बोझ इतना था अहसान का
एक दिन ये हुआ बेजुबाँ होगया

हम अचानक ही ज़रदार क्या‌ होगये
जिसको देखा, वही मेहरबाँ होगया‌

प्यार था जब तलक‌ एक घर में रहे
फिर बिना प्यारके घर मकां होगया

लाख कोशिश हुयी नासमझ ही रहा
हाले-दिल शक्ल पर ही अयां होगया
स्वरूप

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मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़क
है कहाँ चौपाल, पनघट जानता कोई नहीं

बाल आधे उड़ गये हैं और आधे पक गये
वक़्त का आज़ार है ये हमनवा कोई नहीं

उम्र के इस मोड़तक जो साथ थे गायब हुए
अब हुआ तनहा सफ़र शिकवा-गिला कोई नहीं

थे अकेले ,हैं अकेले , रह अकेले जाएंगे
साथ में तनहाइयाँ हैं अन्यथा कोई नहीं
स्वरूप

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हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो

अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो

ज़रा- सा खोलकर रखना दरीचे
इधर आयी अगर बादे -सबा तो

सुलह का रास्ता मालूम तो है
नहीं माना किसी ने मशविरा तो

उसे ख़ामोश रहने की क़सम है
मगर नज़रों से ही कुछ कहदिया तो

मुझे सूरत का अंदाज़ा नहीं है
नहीं होता अगर ये आइना तो

स्वरूप अब साथ अपने भी रहाकर
सफर में ज़िन्दगी के खो गया तो
स्वरूप

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मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़क
है कहाँ चौपाल, पनघट जानता कोई नहीं

बाल आधे उड़ गये हैं और आधे पक गये
वक़्त का आज़ार है ये हमनवा कोई नहीं

उम्र के इस मोड़तक जो साथ थे गायब हुए
अब हुआ तनहा सफ़र शिकवा-गिला कोई नहीं

थे अकेले ,हैं अकेले , रह अकेले जाएंगे
साथ में तनहाइयाँ हैं अन्यथा कोई नहीं
स्वरूप

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हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो

अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो

ज़रा- सा खोलकर रखना दरीचे
इधर आयी अगर बादे -सबा तो

सुलह का रास्ता मालूम तो है
नहीं माना किसी ने मशविरा तो

उसे ख़ामोश रहने की क़सम है
मगर नज़रों से ही कुछ कहदिया तो

मुझे सूरत का अंदाज़ा नहीं है
नहीं होता अगर ये आइना तो

स्वरूप अब साथ अपने भी रहाकर
सफर में ज़िन्दगी के खो गया तो
स्वरूप

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एक शिकवा है ज़िन्दगी से मुझे
छीन ले जाएगी मुझी से मुझे

बेख़याली का इक ख़्याल हूं मैं
कौन अपनाएगा ख़ुशी से मुझे

मुझको ख़ुद्दार कर गयी यारो
प्यार है तब से मुफलिसी से मुझे

इस बुढ़ापे में इन्तहा डर है
मेरे अपनों की बेरुख़ी से मुझे

मैं उसे वो मुझे न छोड़ेगी
इश्क है इतना शाइरी से मुझे

जब से लूटा है क़ाफ़िला मेरा
डर लगा तबसे रहबरी से मुझे

मेरे आमाल इन ख़यालों में
कौन रक्खेगा सादगी से मुझे
स्वरूप

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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या
किसी  नादान से  की दोस्ती क्या
 
न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है
बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या
 
चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं
मुहब्बत की नहीं खलती कमी क्या
 
तलाशे   जा  रहे  जुगुनू  जहां पर
चिरागों  में   नहीं  है  रौशनी क्या
 
अकेलापन   भला  लगने लगा है
बता ,दूभर  हुई  है  ज़िन्दगी क्या
 
करे क्या,जी नहीं लगता है घर में
उसे रास  आगयी आवारगी क्या
 
पुराना  ज़ख़्म  फिर  ताज़ा  हुआ है
किसी की याद फिर आने लगी क्या
स्वरूप
 
 
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चन्द घड़ियां बवाल करती हैं
और सदियां मलाल करती हैं

फ़क़्र है हमको इस बुढ़ापे में
बेटियां देखभाल करती हैं

शक्ल पर वक़्त की लकीरें भी
आइने से सवाल करती हैं

बिन कहे भी हमारी ख़्वाहिश का
सिर्फ़ मांएं ख़याल करती हैं

हद से बेहद हुयी तमन्नाएं
हौसला ही निढाल करतीं हैं

वक़्त पर वक़्त है बहुत भारी
चंद घड़ियां हलाल करती हैं

सोच बदलो 'स्वरूप'अब अपनी
बेटियां भी कमाल करती हैं
स्वरूप

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थकन के बाद भी चलते रहो इसरार करती हैं
मुझे बैसाखियां मेरी बहुत लाचार करती हैं

कभी हालात लमहे में बदलते हैं ज़माने के
कभी सदियां किसी अंजाम से इन्कार करती हैं

कभी कुछ सूरतें पत्थर बनी सी देखते रहिए
कभी कुछ पत्थरों में सूरतें इज़हार करती हैं

ख़ताएं माफ़ करता ही नहीं है आइना मेरी
हुआ जब रूबरू कमज़ोरियां यलगार करती हैं

बुलंदी पागये लेकिन ठहरना भी हुआ मुश्किल
बुलंदी से ज़ियादा तो ढलानें प्यार करती हैं

हमारा दर्द चेहरे से बयां होता नहीं लेकिन
निगोड़ी हैं ये आंखें हाले दिल इज़हार करती हैं

दुआ में बद्दुआ में फ़र्क़ थोड़ा है समझ लीजे
दुआ में हौसला है बद्दुआएं मार करती हैं
स्वरूप

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पतझर जब से

पतझर जब से ओढ़ लिया अमराई ने
सारे   पत्ते   जर्द   किये   पुरवाई   ने
 
ज़रा रोशनी   मेरे घर क्या झांक गयी
आंगन  में  दीवार  खड़ी की  भाई ने
 
अनाकुशी करने से मुझको रोक दिया
सिर्फ़ मुफ़लिसी की हिम्मतअफ़जाई ने
 
दरिया के उथलेपन का अहसास हुआ
बांह  पकड़  ली सागर  की  गहराई ने
 
महफ़िल महफ़िल जीना दूभर कर डाला
जीने  को  मजबूर  किया  तनहाई  ने
 
कितनी बार आइना मुझसे रूठ गया
रिश्ता तोड़ लिया मुझसे रानाई  ने
 
अना परस्ती की हद टूट गयी होती
उसको मुझसे दूर किया रुसवाई ने
किशन स्वरूप 
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आदमी तो आदमी है क्या हुआ गुमनाम है
है नहीं बदनाम, तो ला-इल्म या नाकाम है

बदचलन,बदरंग अब तो ये सियासत हो गयी
शोर भी उसका ज़ियादा जो हुआ नाकाम है

सोचिए,क्या एक मुद्दत को सज़ा हो जायगी
एक लमहा बे-अदब था बस यही इल्ज़ाम है

फूल हैं गुलदान में जितने सभी की है महक
बस यही जम्हूरियत के वास्ते इल्हाम है

ढूंढ़ते रह जाओगे फहरिश्त में शायद कहीं
हाशिए पर ही सही लिक्खा तुम्हारा नाम है

आइने से दोस्ती अच्छी नहीं है दोस्तो
आइना तो सच-बयानी के लिए बदनाम है

हैं बहुत हैरतज़दा सब लोग बस्ती के'स्वरूप'
क्या हुआ कुछ तो हुआहै हरतरफ कुहराम है
स्वरूप

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ज़िन्दगी  का  सफ़र  रुका  ही नहीं
और   कितना  चले  पता  ही  नहीं
 
है  ख़ुदा ,पर  कभी  दिखा  ही नहीं
जब तलक मां है कुछ गिला ही नहीं
 
शक्ल अब  क्या है जानता ही नहीं
रू-ब -रू   मेरे   आइना   ही   नहीं
 
हैं  क़फ़न   जेब   के   बिना   सारे
आदमी  है   कि  मानता  ही  नहीं
 
आज तक  कितने तो मकां बदले
घर जिसे  कहते हैं , बसा ही नहीं
 
वक़्त   के   साथ  चल  नहीं  पाए
कम हुआ फिर ये फासला ही नहीं
 
रोज़   जीते   हैं,  रोज़   मरते   हैं
दो मरज , एक  भी दवा  ही नहीं
स्वरुप
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