All Discussions (39)

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बुद्धवार का कार्यक्रम

गीतिका

 

प्रेम के भावों में जब अवहेलना रक्खी गयी।
मेरे द्वारा फि़र नई प्रस्तावना रक्खी गयी।।

 

जिसने उपवन में सजाये मद भरे रंगीन फूल।
जाने क्यों उसके लिये ही ताड़ना रक्खी गयी।।

 

वृक्ष , पौधे और पशु तक अपने पन से भर गये।
मन में मानवता की जिस क्षण भावना रक्खी

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1 Reply · Reply by SD TIWARI Nov 20, 2019

घनाक्षरी छंद (मनहरन कवित्त)

घनाक्षरी छंद (मनहरन कवित्त)

यह एक वर्णिक छंद है जिसमे प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते है। 8,8,8,7 या 16, 15 पर यति और चरणान्त में गुरुवर्ण होना चाहिये।
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कजिया सबेरे वाली सँझिया क बरसात, 
बड़ा दुःख दे थ भैया ए से रह बचि

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मंगलवार का कार्यक्रम

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

सौ बार निकल आये हैं हम जेह् न के घर से।
हिजरत नहीं कर पाये मगर दिल के नगर से।।

ये क्या कि समन्दर से ही रखता है तआल्लुक़।
बादल है तो बे-आब ज़मीं पर कभी बरसे।।

दहलीज़ शनासाई की मानूस मिलेगी।
जब क़ाफ़ला एहसास का लौटेगा सफ़र से।।

एहसास ये होत

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9 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Nov 20, 2019

कुछ दोहे

 

अंग अंग किसलय सदृश,रजत वर्ण सी देह।
कहो कुमुदिनी कामिनी,किसे न होगा नेह।।

क्षुधित वक्ष को भी मिले,आलिंगन भरपूर।।
निकट आ गयी हो प्रिये,अब मत जाना दूर।

राजनीति में आजकल,ऐसा ही है हाल।।
ज्यों सिंहों की खाल को,पहने मिले शृगाल।।

नेता इनको मत समझ,सोने वाले जाग।

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जब से हुआ हूँ कमतर हमदम तेरी नज़र में

ग़ज़ल
जब से हुआ हूं कमतर हमदम तेरी नज़र में।
अनजान हो गया हूं अपने ही इस नगर में।।

मेरे रकी़ब शामिल करके तो महफ़िलों में।
नश्तर चुभाया जैसे तूने मेरे जिग़र में।।

लगता हुआ है रुख़सत मौसम बहार का ये।
दिखते है ज़र्द पत्ते हर एक अब शजर में।।

मुंह फेर कर न जाओ य

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जब से हुआ हूँ कमतर हमदम तेरी नज़र में

ग़ज़ल

जब से हुआ हूं कमतर हमदम तेरी नज़र में।

अनजान हो गया हूं अपने ही इस नगर में।।

 

मेरे रकी़ब शामिल करके तो महफ़िलों में।

नश्तर चुभाया जैसे तूने मेरे जिग़र में।।

 

लगता हुआ है रुख़सत मौसम बहार का ये।

दिखते है ज़र्द पत्ते हर एक अब शजर में।।

 

मुंह फेर कर न जा

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ग़ज़ल

आइने के उस तरफ़ से इस तरफ़ आते हुए
उम्र गुज़री है ख़ुदी को ख़ुद से मिलवाते हुए

यूँ समझ लीजे हमारी इश्क़ में बेचारगी
डूब जाना था हमें तैराकियाँ आते हुए

जाने उस शब क्या हुआ था मेरी अक़्ल ओ होश को
ख़ुद बहकने लग गया था उसको समझाते हुए

बे सबब कुछ भी नहीं था, ब

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काफ़िया पर ग़ज़ल

एक दूजे को फ़क़त आएँगे वीराने नज़र
क्या मिलेगा आइने को आइने में झाँक कर

जाते जाते ले गया वो दो मसाइल साथ में
इक उसे पाने की हसरत दूसरा खोने का डर

काटना है जानलेवा हर किसी के वास्ते
वस्ल की रंगीनियों के बाद का तन्हा सफ़र

ये हसीं बारिश के मौसम, तितलियाँ

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तेरी पलकों से तो गिरे हैं हम

तेरी पलकों से तो गिरे हैं हम
आरिजों पर ठहर गए हैं हम

कभी मर्ज़ी से चलते फिरते थे
अब जहाँ रख दिया, रखे हैं हम

जो कभी तितलियाँ पकड़ता था
वो नहीं यार, दूसरे हैं हम

वक़्त ने कर दिया है यूँ मिस्मार ----छिन्न भिन्न
रेज़ा रेज़ा बिखर गए हैं हम

तज्रबे की तो कुछ करो वक

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7 Replies · Reply by Dinesh Kumar Drouna Nov 19, 2019

ये सरासर नाव की बेइज़्ज़ती है

 

क्यों तू हसरत से भँवर को देखती है
ये सरासर नाव की बेइज़्ज़ती है

चाँद को छोटा बड़ा दिखला के कुदरत
हर बशर के जविये को आँकती है

इक यही चारा बचा है पास उसके
मैं निकलता हूँ तो पीछे छींकती है

कोई तो पैगाम है आँखों में उसकी
जो वो इक टक आपको ही देखती है

ख़्वाब में

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25 सितंबर 2019, हिंदी रचनाओं का कार्यक्रम

 

*Wednesday program*

*केवल हिंदी छंद-विधा पर आधारित रचनाएँ*

_गीत और नवगीत भी पोस्ट किए जा सकते हैं।_

*शुद्ध हिंदी में कही गयी ग़ज़लें भी पोस्ट की जा सकती हैं*

 

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11 Replies · Reply by SHIFA KAJGAONVI (ISMAT ZAIDI) Sep 25, 2019

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