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सोमवार के लिए ग़ज़ल

मुझसे तू और......चाहता क्या है
मुझमें बाक़ी ही अब बचा क्या है

मुझको तेरी भी.....उम्र लग जाये
ये दुआ है.....या बद्दुआ....क्या है

वो ज़मीं सा तो.....पायमाल नहीं
चाँद पर जा के.....देखना क्या है

मुद्दतों............नींद ही नहीं देखी
मेरे तकिये पे....ख्वाब सा

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मंगलवार के लिए ग़ज़ल

इस अदा से सलाम..आज उसने किया
देखिये हो गई.......इक ग़ज़ल इश्किया

क्या हुआ आपकी आंख..क्यों नम हुई
गीत गाया था हमने......यूँ ही शौकिया

नाम बुनता है रोज़....और उधेड़े है रोज़
कब रुका है भला....वक़्त का क्रोशिया

जब भी माज़ी की स्याही में भीगा क़लम
नज़्म हो या ग़ज़ल...

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1 Reply · Reply by SD TIWARI Feb 26

सोमवार की ग़ज़ल

पत्थर न फेंकना कभी इस सायबान की तरफ़
मत डालना बुरी नज़र तू आसमान की तरफ़

जाता हुजूम है़ सदा ज़ोर-ए-बयान की तरफ़
मुड़कर न देखता कोई भी बे-ज़बान की तरफ़

दीदे निकाल कर तभी रख देंगे हाथ पर अहल
डाली बुरी निगाह जो हिन्दोस्तान की तरफ़

रक्खे ख़याल आपका हर वक़्त स

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का़फि़ये पर ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति


ग़ज़ल


इश्क़ ऐसा सफ़र है जहाँ, उलझनों के घुमाव भी हैं।
ग़म के परबत, कठिन रास्ते, और थकन के पडा़व भी हैं।।

 

दिन का सूरज झुलस देता है, मेरी उम्मीद का गुल्सिताँ।
भस्म करने को चैन-ओ- सुकूँ, रतजगों के अलाव भी हैं।।

 

तुझ से बिछडे़ तो, ए हमनशीं, गंमज

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2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Dec 25, 2019

ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब चाँदनी चँदा की दहलीज़ पे चलती हैं ।
आसेबज़दा रूहें सड़कों पे टहलती हैं।।

दर अस्ल वो नींदे हैं आगोश में अश्कों की।
पलकों की मुंडेरों से हर शब जो फिसलती हैं।।

एे काश..! कि रौशन हों फ़ानूस उम्मीदों के।
आँखो के कटोरों में कुछ शम्एँ प

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2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Dec 25, 2019

भाव की अभिव्यक्ति होती है सरल क्या

भाव की अभिव्यक्ति होती है सरल क्या
पढ़ रहे हो तुम मुखाकृति आज कल क्या

मिल गयी क्यों शक्ति इतनी दानवों को
पी लिया शिव ने निरर्थक ही गरल क्या

सृष्टि का हर एक मानव सोचता है
मृत्यु है संसार में सचमुच अटल क्या

चाँदनी का तरु तले अभिसार तम से
देखकर होता नहीं चंद

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5 Replies · Reply by SD TIWARI Dec 25, 2019

बेहिसों का चुनाव क्यों आख़िर

बेहिसों का चुनाव क्यों आख़िर
वोट का मोल भाव क्यों आख़िर

देश पहले है बाद में मज़हब
ज़ात से फिर लगाव क्यों आख़िर

पार करना है एक ही दरिया
चाहिए चार नाव क्यों आख़िर

एक भाई का जल रहा लाशा
दूसरे का अलाव क्यों आख़िर

मिल के आतंकियों से लड़ने में
मुजरिमों का बचाव क्यों आख़

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8 Replies · Reply by SD TIWARI Dec 25, 2019

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मुश्किलों का दबाव रोज़ बढ़ा 

ज़िंदगी में तनाव रोज़ बढ़ा

 

और भी शख़्स थे ज़माने में 

तुझसे ही क्यों लगाव रोज़ बढ़ा ? 

 

हर नज़र में जवान दिखने को 

जिस्म का रख रखाव रोज़ बढ़ा

 

ऐ सनम तेरे दूर जाने से 

दिल में ग़म का रचाव रोज़ बढ़ा

 

अपने दिल को बचाना था जिससे 

उसकी जानिब झु

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इक राह के मुसाफ़िर, हम भी हैं और तुम भी

इक राह के मुसाफ़िर, हम भी हैं और तुम भी
इक मुश्त ख़ाक आख़िर, हम भी हैं और तुम भी

अपने अलग ख़ुदा हैं, है मुख़्तलिफ़ परस्तिश
इस ज़ाविये से काफ़िर, हम भी हैं और तुम भी

अपनी इबादतों का, चाहें बदल हमेशा
इस तर्ह एक ताजिर, हम भी हैं और तुम भी

हमको गुरूर कितना इस जिस्म

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2 Replies · Reply by Nisha Singhal Dec 20, 2019

मैं ही भगिनी, मैं ही भार्या, मैं जननी बन आई हूँ

 

मैं ही भगिनी, मैं ही भार्या, मैं जननी बन आई हूँ
जो चाहे कह लो मैं अपने साजन की परछाई* हूँ

जोहूँ उनकी बाट, बिछाऊँ पलकें उनकी राहों में
मेरा सारा दर्द मिटे जब सिमटूँ उनकी बाहों में

कौन राम है कौन कृष्ण है मैं इन सब को क्या जानूँ

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अगर हो दिल में सुकूं तो कहाँ नहीं मिलता

अगर हो दिल में सुकूं तो कहाँ नहीं मिलता
मिलेगा ऐसी जगह भी जहाँ नहीं मिलता

हमीं तो राह दिखाते है शम्स को दिन भर
मगर हो शाम तो अपना मकां नहीं मिलता

तुम्हें भुला दूँ तो कैसे कि सारी दुनिया में
तुम्हारे जैसा कोई मेहरबां नहीं मिलता

लिबास जैसे पहनते हैं मुस्क

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5 Replies · Reply by Kewal Krishan Pathak Nov 22, 2019

वृहस्पतिवार का कार्यक्रम

ग़ज़ल

किसी कमाँ से किसी तीर से नहीं गुज़रा।
वो एक लफ़्ज़ जो तहरीर से नहीं गुज़रा।।


तुम्हारा दिल अभी ना आश्ना ए उल्फ़त है।
अभी ये आईना तस्वीर से नहीं गुज़रा।।


न जाने कैसे ज़माने ने पढ़ लिया उस को।
फ़साना ग़म का तो तशहीर से नहीं गुज़रा।।


इसी लिये मैं अभी करबल

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