*Tuesday ke liye qafia*

*आरी* की क़ैद वाले लफ़्ज़

जैसे - *तारी, बीमारी, ज़ारी, यारी, सवारी, पारी, भारी बेदारी....आदि*


*बह्र और रदीफ़ ख़ुद चुनें।*

*हल्के शेर कहने से बचें।*

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Replies

  • ज़िन्दगी कब सनम हमारी है
    ज़िन्दगी अस्ल में तुम्हारी‌ है

    देख आकर हसीन सपनों में
    मैंने तेरी ‌ छवी ‌ उता री है

    जब तलक साथ तेरा मेरा है
    ज़िन्दगी ख़्वाब जैसी प्यारी है

    चान्द‌ को आज मैंने रोका है
    राह में चान्दनी उता री है

    वो नज़र भर के देख लें आकर
    ज़िन्दगी अब तलक कंवारी है

    भूल सकता नहीं कभी मैं भी
    शाह में जां ब सी हमारी है


    शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

     

  • आज के दिए गए क़ाफ़िये पर एक ग़ज़ल की कोशिश...

    आंखें नम कर सकते हो तुम ,पर रोना लाचारी है,
    चोट लगी है तुमको लेकिन ये कल की तय्यारी है,

    इश्क़ तुम्हारा थामूं कैसे दिल के चारों खानों में,
    दिल कमज़ोर है देखो मेरा, इश्क़ ये उस पर भारी है,

    अक्सर दिल की धड़कन सुनकर ,मैं उसमें खो जाता हूं
    धक धक धक धक करती देखो धुन ये कितनी प्यारी है,

    मेरे घर के हर कमरे में सुंदर सुंदर तस्वीरें हैं,
    हर तस्वीर बनाई मैंने ,हर तस्वीर तुम्हारी है,

    मैं तो एक मुसाफ़िर हूं ,मैं हरदम चलता रहता हूं,
    हर रस्ते से बात है अपनी , हर रस्ते से यारी है

    - देवांग (मुसाफ़िर)

  •  

     

    सबसे अच्छी शय ख़ुद्दारी है
    या ये इक ज़हनी बीमारी है

    हार मिली थी जीत के भी जिसमें
    खेल वही तो अब भी जारी है

    नक्श उकेरें कैसे पत्थर पर
    उल्फ़त में कितनी दुश्वारी है

    आँखों में तू छोड़ गया चेहरा
    किस दर्ज़ा तुझमे हुशियारी है

    पाठ पढ़ा नफ़रत का तब जाना
    इस फ़न में कितनी बेकारी है

    मिलकर अब की बार न बिछड़ेंगे
    ये भी इक जुमला सरकारी है

    रिश्ता कोई ख़ास नहीं उनसे
    जो भी है बस कारोबारी है

    हम सब तो कागज़ की कश्ती हैं
    हल्की सी बारिश भी भारी है

    नाच नचाता रहता है सब को
    ईश्वर भी तो एक मदारी है

    अपने मलबे से बाहर निकलो
    देखो दुनिया कितनी प्यारी है

    राख समझकर इससे मत खेलो
    इसमें दबी हुई चिंगारी है

  • ग़ज़ल

    जाम से रग़बत न रखें, तर्क मयखा़री करें।
    यूँ अदा साकी़ से हम रस्म ए वफा़दारी करें।।

    शमअ की लौ थरथरा के हो गयी खु़द ही धुआँ।
    अब अंधेरे जब तलक जी चाहे सरदारी करें।।

    वक़्त, मुमकिन है, बदल दे ये निजाम ए जि़न्दगी।
    खु़शबुएं काँटों की भी इक दिन तरफ़दारी करें।।

    पेश खे़मा हैं किसी तूफाँ का ये खा़मोशियाँ।
    अब सफी़ने डूबने की खु़द ही तैयारी करें।।

    अब के सहरा की जबीं पर ये हवा ने लिख दिया।
    ज़र्द पत्ते मौसमों की नाज़बरदारी करें।।

    उसकी मर्जी़ से है साँसों का ये 'मीना' सिलसिला।
    वो कहे तो जि़न्दगी से दस्त बरदारी करें।।


    मीना नक़वी।

    • Waah waah behtareen

      • so nice of you

    • बहुत ही मेयारी ग़ज़ल हुई मीना जी। हर शेर आला।

  • आदरणीय तिवारी साहब मैं इन दिनों ग़ज़लें नहीं कह रहा हूँ जियादा पड़ने पर ध्यान दे रहा हूँ ,,इसलिए कोई ग़ज़ल यहां पोस्ट नहीं कर पाता ,,मगर दूसरों की ग़ज़लों पर अपनी राय ज़रूर देता हूँ 

    •  यह भी ज़रूरी है। धन्यवाद।

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