Ghazal

 

 

 

ग़ज़ल.  Ghazal
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कुछ तो लिक्खो पढ़ो कि फ़ुरसत है।
शायरी ही करो कि फ़ुरसत है।

और जाना कहीं तो क्या होगा,
ख़ुद को देखें चलो, कि फ़ुरसत है।


ज़िंदगी काटते रहें कब तक,
आज जी भर जियो कि फ़ुरसत है।

तुम से मसरूफ़, ऊब क्या जानें,
वह भी अब देख लो कि फ़ुरसत है।


थी कहाँ मोहलते शिकस्त अब तक,
आज जी हार दो कि फ़ुरसत है।

दिल का एक गोशा अजनबी है अभी,
उस में भी झांक लो कि फ़ुरसत है।

ज़ख़्म जिसको दिखाने आए हो,
उससे पूछो भी तो कि फ़ुरसत है?

जश्ने जां सोज़ी अब करें बरपा,
आओ ऐ दिलजलो कि फ़ुरसत है।

-- अख़तर क़िदवाई

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Replies

  • बेहतरीन है सर जी।

    • बहुत शुक्रिया तिवारीजी।

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