ग़ज़ल

लगाएं आहटों पर कान कब तक
न तोड़े दम भला इमकान कब तक

फरिश्ता हो तो कोई बात भी है
लड़े दुनिया से इक इंसान कब तक

मेरी आँखों में पढ़ लेंगे तुम्हें सब
छुपाओगे भला पहचान कब तक

मैं अक्सर पूछता हूँ धड़कनों से
न छोड़ोगी मेरी तुम जान कब तक

चलो अब जुगनुओं को दोस्त कर लें
सहेंगे शम्स का एहसान कब तक

करो ताख़ीर मत.....तस्वीर ले लो
उदासी पर ढकूं मुस्कान कब तक

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