मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब चाँदनी चँदा की दहलीज़ पे चलती हैं ।
आसेबज़दा रूहें सड़कों पे टहलती हैं।।

दर अस्ल वो नींदे हैं आगोश में अश्कों की।
पलकों की मुंडेरों से हर शब जो फिसलती हैं।।

एे काश..! कि रौशन हों फ़ानूस उम्मीदों के।
आँखो के कटोरों में कुछ शम्एँ पिघलती हैं।।

ख़ुद से ही न हो जाऊँ अन्जान किसी दिन मैं।
हर रोज़ तमन्नायें पौशाक बदलती हैं।।

मसला गया जिस दिन से कलियों को यहाँ 'मीना'।
कुछ ख़ुशबुएं सहरा से हर रात निकलती हैं।।
मीना नक़वी

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Replies

  • हमेशा की तरह एक लाजवाब ग़ज़ल।

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