ग़ज़ल

किसी कमाँ से किसी तीर से नहीं गुज़रा।
वो एक लफ़्ज़ जो तहरीर से नहीं गुज़रा।।


तुम्हारा दिल अभी ना आश्ना ए उल्फ़त है।
अभी ये आईना तस्वीर से नहीं गुज़रा।।


न जाने कैसे ज़माने ने पढ़ लिया उस को।
फ़साना ग़म का तो तशहीर से नहीं गुज़रा।।


इसी लिये मैं अभी करबला में जि़न्दा हूँ।
इरादा खंजर ओ शमशीर से नहीं गुज़रा।।


उसी के नाम रही मुमलेकत मुसर्रत की।
जो "मीना" दर्द की जागीर से नहीं गुज़रा।।

मीना नक़वी

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