गीतिका

 

प्रेम के भावों में जब अवहेलना रक्खी गयी।
मेरे द्वारा फि़र नई प्रस्तावना रक्खी गयी।।

 

जिसने उपवन में सजाये मद भरे रंगीन फूल।
जाने क्यों उसके लिये ही ताड़ना रक्खी गयी।।

 

वृक्ष , पौधे और पशु तक अपने पन से भर गये।
मन में मानवता की जिस क्षण भावना रक्खी गयी।।

 

उस को मन-मन्दिर में रख कर भाव सब अर्पण किये।
आरती के साथ पूजा अर्चना रक्खी गयी।।

 

जब कभी सम्भव हुआ आदेश उस को दे दिया।
और कभी अधरों पे केवल प्रार्थना रक्खी गयी।।

 

दूसरो के दर्द का आभास करने के लिये।
हृदय की अंगनाई में संवेदना रक्खी गयी।।

 

लेखनी में श्रेष्ठ रचना धर्म ही आधार हो!
इस लिये साहित्य में आलोचना रक्खी गयी।।

 

कुछ तो ऐसा लिख सकूँ मैं जिस में जीवित रह सकूँ।
मन में मीना के सदा ये कामना रक्खी गयी।।

मीना नक़वी

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Replies

  • वाह वाह वाह

    बेहतरीन

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