अंग अंग किसलय सदृश,रजत वर्ण सी देह।
कहो कुमुदिनी कामिनी,किसे न होगा नेह।।

क्षुधित वक्ष को भी मिले,आलिंगन भरपूर।।
निकट आ गयी हो प्रिये,अब मत जाना दूर।

राजनीति में आजकल,ऐसा ही है हाल।।
ज्यों सिंहों की खाल को,पहने मिले शृगाल।।

नेता इनको मत समझ,सोने वाले जाग।।
हंस दिख रहे वस्त्र से,शब्दों से हैं काग।।

कब तक मैं रुकता प्रिये,समय कहाँ अनुकूल।।
हिय प्रांगण में आपके,उगने लगे बबूल।।

राम शिरोमणि पाठक

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