ग़ज़ल

जब से हुआ हूं कमतर हमदम तेरी नज़र में।

अनजान हो गया हूं अपने ही इस नगर में।।

 

मेरे रकी़ब शामिल करके तो महफ़िलों में।

नश्तर चुभाया जैसे तूने मेरे जिग़र में।।

 

लगता हुआ है रुख़सत मौसम बहार का ये।

दिखते है ज़र्द पत्ते हर एक अब शजर में।।

 

मुंह फेर कर न जाओ ये रात है मिलन की ।

बाकी है वक़्त काफी होने को तो सहर में।।

 

आंखों से नफ़रतों के बादल तो तुम हटाओ।

ये नूर तब दिखेगा इन शम्स और कम़र में।।

 

किरदार कांच सा है फिर जुड़ न पाएगा ये।

गर गिर गये कहीं जो अपनी ही तुम नज़र में।।

 

बदकारी,बदज़बानी ये बुग्ज़ बदगुमानी।

इतना गुबार क्यों है माटी के इस बशर में।।

 

कट जाएगा खुशी से रस्ता"अनीस " भी ये ।

मुंँह फेर कर न बैठों लम्बे से इस सफ़र में।।

- अनीस शाह "अनीस"

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