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  • क्या हुआ कुछ नहीं,
    ये ख़ता कुछ नहीं,

    ज़िन्दगी से मिरा,
    राब्ता कुछ नहीं,

    जी लिया गम अगर,
    फिर कज़ा कुछ नहीं,

    दोस्ती में मिले,
    वो सज़ा कुछ नहीं,

    है अना गर तुझे,
    आयना कुछ नहीं,

    इश्क़ में जो हुआ,
    हादसा कुछ नहीं,

    बात है आपसी,
    मामला कुछ नहीं,

    बेवफा के लिए,
    है वफ़ा कुछ नहीं,

    मिल गया दिल अगर,
    फासला कुछ नहीं,

    आशिक़ी कर मगर,
    फ़ायदा कुछ नहीं,

    जान ले जंग में,
    कायदा कुछ नहीं,

    हार जो मान ली,
    हौसला कुछ नहीं,

    चोट दिल में लगे,
    तो दवा कुछ नहीं,

    खोज लो ख़ुद को जो,
    लापता कुछ नहीं,

    आपसी बैर से,
    क्या मिला कुछ नहीं,

    आप जो दिख गये,
    फिर दिखा कुछ नहीं

    आप तो आप हो,
    आपसा कुछ नहीं!!

                         संघर्ष (आगरा से )

  • सफ़र को फिर वहीं ले जा रहे हैं
    ख़ुतूत उनके उन्हें लौटा रहे हैं

    हमारी मौत के क्या फ़ायदे हैं
    हम अपने आप को समझा रहे हैं

    कहाँ के राहबर कैसी मसाफ़त
    हमें ये लोग बस टहला रहे हैं

    ग़ज़ल शेर-ओ-सुख़न कुछ भी नहीं बस
    हम अपने आप से बतला रहे हैं

    ज़रा सी बात है कैसा तमाशा
    उन्हें जाना था और वो जा रहे हैं

    सितम ये है कि जिसको छोड़ना है
    उसी को साथ में ले जा रहे हैं

    ये कह कर "आप जो चाहोगे होगा"
    वो अपनी बात ही मनवा रहे हैं

    वो जो रहते हैं इक दरिया किनारे
    वो हमको तिश्नगी समझा रहे हैं

    उजालों के लिए खोली थी खिड़की
    मगर घर से अँधेरे जा रहे हैं

    ®© द्रौण 'जयपुर'

    द्रौण 'जयपुर'
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  • मेरी एक ग़ज़ल :

    वो मुझसे दूर है माना , मगर हर वक़्त मेरी है।
    तसव्वुर में मिरे हर पल वो मेरे साथ होती है।

    शब-ए-हिज्रां से डरते हो ,मुहब्बत क्या करोगे तुम?
    फ़िराक़-ए-यार से यारों मुहब्बत और बढ़ती है।

    अंधेरे रास्ते तुमको सतायेंगे बहुत लेकिन
    जो तुम चलते गए इक रोशनी इसमें उभरती है।

    बहुत ही पुरसुकूँ सी दिख रही है ये कली लेकिन
    किसी तूफ़ान के डर से ये अंदर से सिहरती है।

    अगर कल उसको जाना था तो अब तक जा चुका होगा
    घड़ी को रोकने से क्या समय की चाल रुकती है?

    मुझे मालूम है लेकिन कलैंडर को मैं क्या बदलूँ ?
    मेरे दिन तो नहीं बदले , फ़क़त तारीख़ बदली है

    सुनहरी रोशनी बाहर से अच्छी लग रही होगी
    मगर ये आग है "सूफ़ी" जो अंदर से दहकती है।

    शुभम् सूफ़ियाना "सूफ़ी"

  • ग़ज़ल:
    दिल में बसती जाती है,
    रात ये कितनी गहरी है

    एक उदासी कमरे में,
    घात लगाए बैठी है,


    पानी पत्थर होगा अब,
    एक नदी जो ठहरी है,


    देख के खुद को हंसता हूं,
    ये आदत भी अच्छी है,


    ये तन्हाई कुछ भी हो,
    बातें अच्छी करती है,

     

    मुसाफ़िर

  •  

    मैं  लिखता नहीं हर्फ़-ए-सदाक़त के सिवा कुछ
    सो मुझको मयस्सर नहीं वहशत के सिवा कुछ

     

    जिसको  है  बदलते  हुए  हालात  का इलहाम 
    सूझेगा भला क्या  उसे  दहशत  के सिवा कुछ

     

    हँसता    है    मेरी    दर्द- बयानी   पे   ज़माना
    सो  पूछिए  मुझसे  मेरी  हालत के सिवा कुछ

     

    जो  हक़  है  वो  मिल जाए उसे एक दफ़अ में 
    मज़दूर  नहीं  चाहता  उजरत  के  सिवा  कुछ

     

    तारी  जो  हर  इंसान  पे  मज़हब  का  नशा है
    तोड़ उसका नहीं और है वहदत के सिवा कुछ

     

    दौलत  है  न  शोहरत है न ओहदा है न ताक़त
    चाहा  भी  नहीं "दीप" ने इज़्ज़त के सिवा कुछ

     

    भरत दीप

    • बहुत ख़ूब

    • वाह वाह वाह । शानदार ग़ज़ल दीप जी।

    • शानदार ग़ज़ल हुई है जनाब क्या कहने 

  • ग़ज़ल

    हज़ार बार भले ही मैं हार जाऊँगा ।
    मगर ये तय है मैं दरिया के पार जाऊँगा ।

    मेरे मिज़ाज में बिल्कुल नहीं फ़रामोशी ,
    हरेक क़र्ज़ जहाँ का उतार जाऊँगा ।

    वो झूठ बोल के दुनियाँ को चुप करा देगा ,
    मैं सच कहूँगा मगर फिर भी हार जाऊँगा ।

    मेरे वुजूद का जाना नहीं है खेल कोई ,
    हरेक सिम्त उठाकर ग़ुबार जाऊँगा ।

    जो तुमने लोगों के दिल में बढा दीं नफ़रत से ,
    मैं ख़त्म करके वो सारी दरार जाऊँगा ।

    हवाला दे कोई 'नादान' जो मुहब्बत का ,
    तुम्हारा नाम दिलों पर उभार जाऊँगा ।

    राकेश 'नादान'

    • क्या बात है उम्दा ग़ज़ल

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