*Wednesday program*

*केवल हिंदी छंद-विधा पर आधारित रचनाएँ*

_गीत और नवगीत भी पोस्ट किए जा सकते हैं।_

*शुद्ध हिंदी में कही गयी ग़ज़लें भी पोस्ट की जा सकती हैं*

 

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Replies

  • दोहे
    _____

    मन में इच्छा है अगर , परहित जीवन मान ।
    गौरव गाथा बाँच कर , काहे का अभिमान ॥
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    धन दौलत की चाह में, बौराया संसार ।
    राज सिहाँसन पाएगा, खो देगा परिवार ॥
    __________

    लालच रूपी नाग को , जो वश में कर पाय ।
    बस वो मानव ज्ञान का सही अर्थ समझाय ||
    __________

    टिक टिक कर के हर घड़ी, देती यही बताय ।
    जीवन गति का नाम है, जड़ मानुष पछताय ॥
    __________

    पायल को छनकाय के , गोरी यूँ शरमाय ।
    छुई मुई की पाति ज्यों , सिमटी सिमटी जाय ॥
    __________________________________

    • बेहतरीन दोहे हैं आदरणीया

  • मेरी उपस्थिति

    गीतिका

    जब बसंती रंग ले कर धरती से अम्बर मिला।
    अपने प्राणों के लिये चिन्तित बहुत पतझर मिला।।

    लेखनी के सूखे अधरों को भिगोयें किस तरह।
    शब्द की संयोजनाओं से विमुख अक्षर मिला।।

    उषा की रक्तिम छटा से ये हुआ आभास सा।
    नव वधु से जैसे शुभ बेला मे उसका वर मिला।।

    प्रेम की पावन ऋचा का पाठ करने के लिये।
    'मीत मन से मन मिला और स्वर से स्वर मिला'।।

    जाने किस आशंका से लहरों का मन कंपित हुआ।
    जब नदी से मिलने को आतुर स्वयं सागर मिला।।

    आधुनिकता में हुयी यूँ संस्कारों की बलि।
    सद् गुणों के बीज को हर खेत ही बंजर मिला।।

    लक्ष्य पर अंकित किया है , जिसने केवल मेरा नाम।
    मेरे हर पथ पर मुझे वह मील का पत्थर मिला।।

    'मीना' मैं हूँ भाग्यशाली लेखनी के क्षेत्र में।
    हिन्दी में सम्मान पाया, उर्दू मे आदर मिला।।

    मीना नक़वी

  •  

    वो महकी शेफालियाँ,कम हो गईं जनाब,
    वो अमुवा की डालियाँ,कम हो गईं जनाब।

    हाय पश्चिमी होड़ में ,गुम देसी परिधान ,
    वो हँसली वो बालियाँ,कम हो गईं जनाब।

    मँहगाई के दौर में , फीके सब त्योहार,
    वो होली - दीवालियाँ ,कम हो गईं जनाब।

    इस विकास की दौड़ में,कटे वृक्ष चहुँ ओर,
    खेतों में हरियालियाँ,कम हो गईं जनाब।

    दिन -प्रतिदिन बढ़ने लगा,अंग्रेज़ी का शोर,
    माँ हिन्दी को तालियाँ,कम हो गईं जनाब।

    भरत दीप

    • बहुत सुन्दर

    • बहुत ही बढ़िया दोहा ग़ज़ल

  •  

    बस इतना सा समाचार है

    घूरे पर बैठा बच्चा
    खाने को कुछ भी बीन रहा है
    लगता है विधिना से लड़कर
    अपना जीवन छीन रहा है
    इसको भी जीना कहते हैं
    मन में आता यह विचार है
    बस इतना सा समाचार है

    अपने बालों के झुरमुट से
    जाने क्या वह खींच रही है
    बूढी दादी गिने झुर्रियाँ
    गले मसूढ़े भींच रही है
    जीने की इच्छा तो मृत है
    मरने तक ज़िंदगी भार है
    बस इतना सा समाचार है

    अब की बार फसल अच्छी हो
    तोघर में कुछ काम कराऊँ
    प्लास्टिक फटी हुई है छाजन की
    फिर एक नयी लगवाऊँ
    सीलन से सब खाँस रहे हैं
    छोटी बिटिया को बुखार है
    बस इतना सा समाचार है

    बड़की की शादी करनी है
    कुछ उधार तो लेना होगा
    भूखे पेट भले रह लेंगे
    पर दहेज़ तो देना होगा
    वर्ना रिश्तेदार कसेंगे ताने
    "बिटिया बनी भार है"
    बस इतना सा समाचार है

    • हद हो गयी। किसी ने पढ़ा ही नहीं।

      • सुन्दर रचना

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