सोमवार की ग़ज़ल (11)

हवाओं में गर उल्फ़त  और पानी में मुरव्वत हो

हवाओं में गर उल्फ़त  और पानी में मुरव्वत हो

वतन प्यारा ये मेरा और भी कुछ ख़ूबसूरत हो

 

सियासत जब तिजारत हो तिजारत जब सियासत  हो

कहो इस हाल में  कैसे उसूलों की हिफ़ाज़त हो

 

शिफ़ाख़ाने में तेरे ऐ हक़ीम इतनी तो राहत हो

न जीने की सहूलत हो तो मरने की इजाज़त हो

 

ज़बां पर

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2 Replies · Reply by Mrs. RAJESH KUMARI May 4

Ghazal

 

 

 

ग़ज़ल.  Ghazal
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कुछ तो लिक्खो पढ़ो कि फ़ुरसत है।
शायरी ही करो कि फ़ुरसत है।

और जाना कहीं तो क्या होगा,
ख़ुद को देखें चलो, कि फ़ुरसत है।


ज़िंदगी काटते रहें कब तक,
आज जी भर जियो कि फ़ुरसत है।

तुम से मसरूफ़, ऊब क्या जानें,
वह भी अब देख लो कि फ़ुरसत ह

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2 Replies · Reply by Akhtar Ansar Kidwai Apr 21

ग़ज़ल

 

ग़ज़ल

 

उदासियों का ही जोहड़ जो दिल में पाला है

ये ज़िन्दगी का समन्दर कभी खँगाला है?

 

हमारे हक़ में बयान आपका ? ख़ुदा रक्खे!

हुज़ूर दाल में कुछ तो ज़रूर काला है

 

दिखाई देता नहीं हाथ हाथ को अब तो

कोई बताए ये किस रंग का उजाला है।

 

कोई बचा ही नहीं उसकी भूख से अब तक

हर

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ग़ज़ल

लगाएं आहटों पर कान कब तक
न तोड़े दम भला इमकान कब तक

फरिश्ता हो तो कोई बात भी है
लड़े दुनिया से इक इंसान कब तक

मेरी आँखों में पढ़ लेंगे तुम्हें सब
छुपाओगे भला पहचान कब तक

मैं अक्सर पूछता हूँ धड़कनों से
न छोड़ोगी मेरी तुम जान कब तक

चलो अब जुगनुओं को दोस्त कर लें
सहे

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वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है

ग़ज़ल
वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है।
कमाल फिर भी तो ख़ुद को ज़हीन कहता है।।

ज़माना उसके लिए महजबीन कहता है।
वो ख़ुद को फिर भी तो पर्दा नशीन कहता है।।

कहें जो सच तो है मुमकिन ज़बान साथ न दे।
मगर वो झूठ बहुत बेहतरीन कहता है।।

है टूटना इसे इक दिन ज़रुर

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2 Replies · Reply by Anish Shah Mar 3

सोमवार के लिए ग़ज़ल

मुझसे तू और......चाहता क्या है
मुझमें बाक़ी ही अब बचा क्या है

मुझको तेरी भी.....उम्र लग जाये
ये दुआ है.....या बद्दुआ....क्या है

वो ज़मीं सा तो.....पायमाल नहीं
चाँद पर जा के.....देखना क्या है

मुद्दतों............नींद ही नहीं देखी
मेरे तकिये पे....ख्वाब सा

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सोमवार की ग़ज़ल

पत्थर न फेंकना कभी इस सायबान की तरफ़
मत डालना बुरी नज़र तू आसमान की तरफ़

जाता हुजूम है़ सदा ज़ोर-ए-बयान की तरफ़
मुड़कर न देखता कोई भी बे-ज़बान की तरफ़

दीदे निकाल कर तभी रख देंगे हाथ पर अहल
डाली बुरी निगाह जो हिन्दोस्तान की तरफ़

रक्खे ख़याल आपका हर वक़्त स

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ग़ज़ल

ग़ज़ल 

मुश्किलों का दबाव रोज़ बढ़ा 

ज़िंदगी में तनाव रोज़ बढ़ा

 

और भी शख़्स थे ज़माने में 

तुझसे ही क्यों लगाव रोज़ बढ़ा ? 

 

हर नज़र में जवान दिखने को 

जिस्म का रख रखाव रोज़ बढ़ा

 

ऐ सनम तेरे दूर जाने से 

दिल में ग़म का रचाव रोज़ बढ़ा

 

अपने दिल को बचाना था जिससे 

उसकी जानिब झु

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ग़ज़ल

आइने के उस तरफ़ से इस तरफ़ आते हुए
उम्र गुज़री है ख़ुदी को ख़ुद से मिलवाते हुए

यूँ समझ लीजे हमारी इश्क़ में बेचारगी
डूब जाना था हमें तैराकियाँ आते हुए

जाने उस शब क्या हुआ था मेरी अक़्ल ओ होश को
ख़ुद बहकने लग गया था उसको समझाते हुए

बे सबब कुछ भी नहीं था, ब

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तेरी पलकों से तो गिरे हैं हम

तेरी पलकों से तो गिरे हैं हम
आरिजों पर ठहर गए हैं हम

कभी मर्ज़ी से चलते फिरते थे
अब जहाँ रख दिया, रखे हैं हम

जो कभी तितलियाँ पकड़ता था
वो नहीं यार, दूसरे हैं हम

वक़्त ने कर दिया है यूँ मिस्मार ----छिन्न भिन्न
रेज़ा रेज़ा बिखर गए हैं हम

तज्रबे की तो कुछ करो वक

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7 Replies · Reply by Dinesh Kumar Drouna Nov 19, 2019
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