शुक्रवार-चुनिंदा अशआर (2)

कुछ दोहे

 

अंग अंग किसलय सदृश,रजत वर्ण सी देह।
कहो कुमुदिनी कामिनी,किसे न होगा नेह।।

क्षुधित वक्ष को भी मिले,आलिंगन भरपूर।।
निकट आ गयी हो प्रिये,अब मत जाना दूर।

राजनीति में आजकल,ऐसा ही है हाल।।
ज्यों सिंहों की खाल को,पहने मिले शृगाल।।

नेता इनको मत समझ,सोने वाले जाग।

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