शनिवार-फ़िलबदीह (3)

ग़ज़ल

 

हो सकता है......आदाबे वफ़ा सीख रहा हो
मुमकिन तो नहीं है.....वो मुझे भूल गया हो

लहजे में नफासत ये तिलावत सा तलफ़्फ़ुज़
हर लफ्ज़ तेरा जैसे......कोई लफ़्ज़े दुआ हो

लिखता हूँ हथेली पे........तेरा नाम कि जैसे
कुमकुम से पुजारी ने कहीं......ॐ लिखा हो

आये वो दरीचे म

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ये सरासर नाव की बेइज़्ज़ती है

 

क्यों तू हसरत से भँवर को देखती है
ये सरासर नाव की बेइज़्ज़ती है

चाँद को छोटा बड़ा दिखला के कुदरत
हर बशर के जविये को आँकती है

इक यही चारा बचा है पास उसके
मैं निकलता हूँ तो पीछे छींकती है

कोई तो पैगाम है आँखों में उसकी
जो वो इक टक आपको ही देखती है

ख़्वाब में

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शनिवार और रविवार-फ़िलबदीह


*For Saturday and Sunday*
*फ़िलबदीह के लिए मिसरा*

*मैं तेरा कोई नहीं हूँ, तू मेरा कोई नहीं*

*2122 2122 2122 212*
*फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन*


*क़ाफ़िया... "आ" की क़ैद के*
*रदीफ़... कोई नहीं*


*कुछ क़वाफ़ी - क्या, तेरा, उठा, गिरा, जला आदि*

*■ मतले में अल

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5 Replies · Reply by shahab uddin shah Sep 22, 2019
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