वृहस्पतिवार-दी गई बह्र में ग़ज़ल (4)

ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

ग़ज़ल

जब चाँदनी चँदा की दहलीज़ पे चलती हैं ।
आसेबज़दा रूहें सड़कों पे टहलती हैं।।

दर अस्ल वो नींदे हैं आगोश में अश्कों की।
पलकों की मुंडेरों से हर शब जो फिसलती हैं।।

एे काश..! कि रौशन हों फ़ानूस उम्मीदों के।
आँखो के कटोरों में कुछ शम्एँ प

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2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Dec 25, 2019

इक राह के मुसाफ़िर, हम भी हैं और तुम भी

इक राह के मुसाफ़िर, हम भी हैं और तुम भी
इक मुश्त ख़ाक आख़िर, हम भी हैं और तुम भी

अपने अलग ख़ुदा हैं, है मुख़्तलिफ़ परस्तिश
इस ज़ाविये से काफ़िर, हम भी हैं और तुम भी

अपनी इबादतों का, चाहें बदल हमेशा
इस तर्ह एक ताजिर, हम भी हैं और तुम भी

हमको गुरूर कितना इस जिस्म

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2 Replies · Reply by Nisha Singhal Dec 20, 2019

वृहस्पतिवार का कार्यक्रम

ग़ज़ल

किसी कमाँ से किसी तीर से नहीं गुज़रा।
वो एक लफ़्ज़ जो तहरीर से नहीं गुज़रा।।


तुम्हारा दिल अभी ना आश्ना ए उल्फ़त है।
अभी ये आईना तस्वीर से नहीं गुज़रा।।


न जाने कैसे ज़माने ने पढ़ लिया उस को।
फ़साना ग़म का तो तशहीर से नहीं गुज़रा।।


इसी लिये मैं अभी करबल

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अगर हो दिल में सुकूं तो कहाँ नहीं मिलता

अगर हो दिल में सुकूं तो कहाँ नहीं मिलता
मिलेगा ऐसी जगह भी जहाँ नहीं मिलता

हमीं तो राह दिखाते है शम्स को दिन भर
मगर हो शाम तो अपना मकां नहीं मिलता

तुम्हें भुला दूँ तो कैसे कि सारी दुनिया में
तुम्हारे जैसा कोई मेहरबां नहीं मिलता

लिबास जैसे पहनते हैं मुस्क

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5 Replies · Reply by Kewal Krishan Pathak Nov 22, 2019
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