मंगलवार- क़ाफ़िया पर ग़ज़ल (11)

आपका क्या है आप रो लेंगे

ग़ज़ल
आपका क्या है आप रो लेंगे।
और बेचैन हम तो सो लेंगे।।

आप जितना ज़ियादा बोलेंगे।
पोल अपनी ही आप खोलेंगे।।

बैठकर छेद गर करोगे तो।
आप कश्ती ही खुद डुबो लेंगे।।

आपको सब जबाब मिल जायें।
अपने दिल को अगर टटोलेंगे।।

मुझपे छीटे उछाल कर के अब।
आप बेदाग़ कैसे हो ले

Read more…
0 Replies

उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं

 

ग़ज़ल
उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं।
चराग़ों के लिए तो बस अंधेरों में जलाते हैं।।

वो अपनी दोस्ती और दुश्मनी का हक़ अदा करते।
बढ़ाते हौसला भी है कभी मुझको गिराते हैं।।

खड़ी करते तो हैं वो रोज़ ही दीवार नफ़रत की।
मगर हम उसमें दरवाजा मुहब्बत से ब

Read more…
0 Replies

महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है

ग़ज़ल

महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है।
अब इसकी मुहब्बत में हर ज़ुल्म ग़वारा है ।।

इक तुम ही अकेले तो हक़दार नहीं इसके।
ये जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा है।।

हम शान तिरंगे की कम होने नहीं देंगे।
ये ज़ान भी दे देंगे होगा जो इशारा है।।

जो देख रहे हैं हम ये

Read more…
0 Replies

मंगलवार के लिए ग़ज़ल

इस अदा से सलाम..आज उसने किया
देखिये हो गई.......इक ग़ज़ल इश्किया

क्या हुआ आपकी आंख..क्यों नम हुई
गीत गाया था हमने......यूँ ही शौकिया

नाम बुनता है रोज़....और उधेड़े है रोज़
कब रुका है भला....वक़्त का क्रोशिया

जब भी माज़ी की स्याही में भीगा क़लम
नज़्म हो या ग़ज़ल...

Read more…
1 Reply · Reply by SD TIWARI Feb 26

का़फि़ये पर ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति


ग़ज़ल


इश्क़ ऐसा सफ़र है जहाँ, उलझनों के घुमाव भी हैं।
ग़म के परबत, कठिन रास्ते, और थकन के पडा़व भी हैं।।

 

दिन का सूरज झुलस देता है, मेरी उम्मीद का गुल्सिताँ।
भस्म करने को चैन-ओ- सुकूँ, रतजगों के अलाव भी हैं।।

 

तुझ से बिछडे़ तो, ए हमनशीं, गंमज

Read more…
2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Dec 25, 2019

बेहिसों का चुनाव क्यों आख़िर

बेहिसों का चुनाव क्यों आख़िर
वोट का मोल भाव क्यों आख़िर

देश पहले है बाद में मज़हब
ज़ात से फिर लगाव क्यों आख़िर

पार करना है एक ही दरिया
चाहिए चार नाव क्यों आख़िर

एक भाई का जल रहा लाशा
दूसरे का अलाव क्यों आख़िर

मिल के आतंकियों से लड़ने में
मुजरिमों का बचाव क्यों आख़

Read more…
8 Replies · Reply by SD TIWARI Dec 25, 2019

जब से हुआ हूँ कमतर हमदम तेरी नज़र में

ग़ज़ल
जब से हुआ हूं कमतर हमदम तेरी नज़र में।
अनजान हो गया हूं अपने ही इस नगर में।।

मेरे रकी़ब शामिल करके तो महफ़िलों में।
नश्तर चुभाया जैसे तूने मेरे जिग़र में।।

लगता हुआ है रुख़सत मौसम बहार का ये।
दिखते है ज़र्द पत्ते हर एक अब शजर में।।

मुंह फेर कर न जाओ य

Read more…
0 Replies

जब से हुआ हूँ कमतर हमदम तेरी नज़र में

ग़ज़ल

जब से हुआ हूं कमतर हमदम तेरी नज़र में।

अनजान हो गया हूं अपने ही इस नगर में।।

 

मेरे रकी़ब शामिल करके तो महफ़िलों में।

नश्तर चुभाया जैसे तूने मेरे जिग़र में।।

 

लगता हुआ है रुख़सत मौसम बहार का ये।

दिखते है ज़र्द पत्ते हर एक अब शजर में।।

 

मुंह फेर कर न जा

Read more…
0 Replies

काफ़िया पर ग़ज़ल

एक दूजे को फ़क़त आएँगे वीराने नज़र
क्या मिलेगा आइने को आइने में झाँक कर

जाते जाते ले गया वो दो मसाइल साथ में
इक उसे पाने की हसरत दूसरा खोने का डर

काटना है जानलेवा हर किसी के वास्ते
वस्ल की रंगीनियों के बाद का तन्हा सफ़र

ये हसीं बारिश के मौसम, तितलियाँ

Read more…
0 Replies

मंगलवार का कार्यक्रम

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

सौ बार निकल आये हैं हम जेह् न के घर से।
हिजरत नहीं कर पाये मगर दिल के नगर से।।

ये क्या कि समन्दर से ही रखता है तआल्लुक़।
बादल है तो बे-आब ज़मीं पर कभी बरसे।।

दहलीज़ शनासाई की मानूस मिलेगी।
जब क़ाफ़ला एहसास का लौटेगा सफ़र से।।

एहसास ये होत

Read more…
9 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Nov 20, 2019

24th September 2019 Tuesday ke liye qafia

 

*Tuesday ke liye qafia*

*आरी* की क़ैद वाले लफ़्ज़

जैसे - *तारी, बीमारी, ज़ारी, यारी, सवारी, पारी, भारी बेदारी....आदि*


*बह्र और रदीफ़ ख़ुद चुनें।*

*हल्के शेर कहने से बचें।*

Read more…
10 Replies · Reply by shahab uddin shah Sep 24, 2019
RSS
Email me when there are new items in this category –

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा

Designed and managed by Shesh Dhar Tiwari for Sukhanvar International