All Discussions (35)

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आपका क्या है आप रो लेंगे

ग़ज़ल
आपका क्या है आप रो लेंगे।
और बेचैन हम तो सो लेंगे।।

आप जितना ज़ियादा बोलेंगे।
पोल अपनी ही आप खोलेंगे।।

बैठकर छेद गर करोगे तो।
आप कश्ती ही खुद डुबो लेंगे।।

आपको सब जबाब मिल जायें।
अपने दिल को अगर टटोलेंगे।।

मुझपे छीटे उछाल कर के अब।
आप बेदाग़ कैसे हो ले

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हाथ मेरे हैं बँधे हाथ मिलाऊँ कैसे

ग़ज़ल
हाथ मेरे हैं बँधे हाथ मिलाऊँ कैसे।
पास होकर भी तेरे पास मैं आऊँ कैसे।।

मेरे अंदर भी मचलता है समंदर लेकिन।
तेरे होठों की अभी प्यास बुझाऊँ कैसे।।

वक़्त ने डाल दी ज़ंजीर मेरे पैरों में।
दौड़कर तुझको गले यार लगाऊँ कैसे।।

ज़ह्र आलूदा मेरे हाथ हुए हैं हमदम

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उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं

 

ग़ज़ल
उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं।
चराग़ों के लिए तो बस अंधेरों में जलाते हैं।।

वो अपनी दोस्ती और दुश्मनी का हक़ अदा करते।
बढ़ाते हौसला भी है कभी मुझको गिराते हैं।।

खड़ी करते तो हैं वो रोज़ ही दीवार नफ़रत की।
मगर हम उसमें दरवाजा मुहब्बत से ब

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गीतिका

स्वयं की हानि करनेसे अधिक उन्माद क्या होगा
जहां अग्नि हो जिह्वा पर...वहां संवाद क्या होगा

जहांपर न्याय की कुर्सीका हो अन्याय अधिकारी
वहां पर तर्क क्या होंगे.…वहां प्रतिवाद क्या होगा

हसें...बोलें...उठें...बैठें....भुला कर भेद भावों को
धरा की गोद से विस्तृत

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ग़ज़ल

लगाएं आहटों पर कान कब तक
न तोड़े दम भला इमकान कब तक

फरिश्ता हो तो कोई बात भी है
लड़े दुनिया से इक इंसान कब तक

मेरी आँखों में पढ़ लेंगे तुम्हें सब
छुपाओगे भला पहचान कब तक

मैं अक्सर पूछता हूँ धड़कनों से
न छोड़ोगी मेरी तुम जान कब तक

चलो अब जुगनुओं को दोस्त कर लें
सहे

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ग़ज़ल

जब से आया फसाद छंदों में
भर गया है मवाद.....छंदों में

सुन के आते हैं..दाद में आंसू
है बहुत आर्तनाद......छंदों में

इनको तो...निर्विवाद रहने दो
क्यों मिलाते हो..वाद छंदों में

कोई आये कबीर..या दिनकर
फूंक जाए निनाद......छंदों में

गीत ग़ज़लें हों.....शेर या दोहे
कब

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महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है

ग़ज़ल

महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है।
अब इसकी मुहब्बत में हर ज़ुल्म ग़वारा है ।।

इक तुम ही अकेले तो हक़दार नहीं इसके।
ये जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा है।।

हम शान तिरंगे की कम होने नहीं देंगे।
ये ज़ान भी दे देंगे होगा जो इशारा है।।

जो देख रहे हैं हम ये

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वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है

ग़ज़ल
वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है।
कमाल फिर भी तो ख़ुद को ज़हीन कहता है।।

ज़माना उसके लिए महजबीन कहता है।
वो ख़ुद को फिर भी तो पर्दा नशीन कहता है।।

कहें जो सच तो है मुमकिन ज़बान साथ न दे।
मगर वो झूठ बहुत बेहतरीन कहता है।।

है टूटना इसे इक दिन ज़रुर

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2 Replies · Reply by Anish Shah Mar 3

सोमवार के लिए ग़ज़ल

मुझसे तू और......चाहता क्या है
मुझमें बाक़ी ही अब बचा क्या है

मुझको तेरी भी.....उम्र लग जाये
ये दुआ है.....या बद्दुआ....क्या है

वो ज़मीं सा तो.....पायमाल नहीं
चाँद पर जा के.....देखना क्या है

मुद्दतों............नींद ही नहीं देखी
मेरे तकिये पे....ख्वाब सा

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मंगलवार के लिए ग़ज़ल

इस अदा से सलाम..आज उसने किया
देखिये हो गई.......इक ग़ज़ल इश्किया

क्या हुआ आपकी आंख..क्यों नम हुई
गीत गाया था हमने......यूँ ही शौकिया

नाम बुनता है रोज़....और उधेड़े है रोज़
कब रुका है भला....वक़्त का क्रोशिया

जब भी माज़ी की स्याही में भीगा क़लम
नज़्म हो या ग़ज़ल...

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1 Reply · Reply by SD TIWARI Feb 26

सोमवार की ग़ज़ल

पत्थर न फेंकना कभी इस सायबान की तरफ़
मत डालना बुरी नज़र तू आसमान की तरफ़

जाता हुजूम है़ सदा ज़ोर-ए-बयान की तरफ़
मुड़कर न देखता कोई भी बे-ज़बान की तरफ़

दीदे निकाल कर तभी रख देंगे हाथ पर अहल
डाली बुरी निगाह जो हिन्दोस्तान की तरफ़

रक्खे ख़याल आपका हर वक़्त स

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का़फि़ये पर ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति


ग़ज़ल


इश्क़ ऐसा सफ़र है जहाँ, उलझनों के घुमाव भी हैं।
ग़म के परबत, कठिन रास्ते, और थकन के पडा़व भी हैं।।

 

दिन का सूरज झुलस देता है, मेरी उम्मीद का गुल्सिताँ।
भस्म करने को चैन-ओ- सुकूँ, रतजगों के अलाव भी हैं।।

 

तुझ से बिछडे़ तो, ए हमनशीं, गंमज

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2 Replies · Reply by Dr.meena naqvi Dec 25, 2019

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