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हवाओं में गर उल्फ़त  और पानी में मुरव्वत हो

हवाओं में गर उल्फ़त  और पानी में मुरव्वत हो

वतन प्यारा ये मेरा और भी कुछ ख़ूबसूरत हो

 

सियासत जब तिजारत हो तिजारत जब सियासत  हो

कहो इस हाल में  कैसे उसूलों की हिफ़ाज़त हो

 

शिफ़ाख़ाने में तेरे ऐ हक़ीम इतनी तो राहत हो

न जीने की सहूलत हो तो मरने की इजाज़त हो

 

ज़बां पर

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2 Replies · Reply by Mrs. RAJESH KUMARI May 4

Ghazal

 

 

 

ग़ज़ल.  Ghazal
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कुछ तो लिक्खो पढ़ो कि फ़ुरसत है।
शायरी ही करो कि फ़ुरसत है।

और जाना कहीं तो क्या होगा,
ख़ुद को देखें चलो, कि फ़ुरसत है।


ज़िंदगी काटते रहें कब तक,
आज जी भर जियो कि फ़ुरसत है।

तुम से मसरूफ़, ऊब क्या जानें,
वह भी अब देख लो कि फ़ुरसत ह

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2 Replies · Reply by Akhtar Ansar Kidwai Apr 21

ग़ज़ल

 

हो सकता है......आदाबे वफ़ा सीख रहा हो
मुमकिन तो नहीं है.....वो मुझे भूल गया हो

लहजे में नफासत ये तिलावत सा तलफ़्फ़ुज़
हर लफ्ज़ तेरा जैसे......कोई लफ़्ज़े दुआ हो

लिखता हूँ हथेली पे........तेरा नाम कि जैसे
कुमकुम से पुजारी ने कहीं......ॐ लिखा हो

आये वो दरीचे म

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ग़ज़ल

 

ग़ज़ल

 

उदासियों का ही जोहड़ जो दिल में पाला है

ये ज़िन्दगी का समन्दर कभी खँगाला है?

 

हमारे हक़ में बयान आपका ? ख़ुदा रक्खे!

हुज़ूर दाल में कुछ तो ज़रूर काला है

 

दिखाई देता नहीं हाथ हाथ को अब तो

कोई बताए ये किस रंग का उजाला है।

 

कोई बचा ही नहीं उसकी भूख से अब तक

हर

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आपका क्या है आप रो लेंगे

ग़ज़ल
आपका क्या है आप रो लेंगे।
और बेचैन हम तो सो लेंगे।।

आप जितना ज़ियादा बोलेंगे।
पोल अपनी ही आप खोलेंगे।।

बैठकर छेद गर करोगे तो।
आप कश्ती ही खुद डुबो लेंगे।।

आपको सब जबाब मिल जायें।
अपने दिल को अगर टटोलेंगे।।

मुझपे छीटे उछाल कर के अब।
आप बेदाग़ कैसे हो ले

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हाथ मेरे हैं बँधे हाथ मिलाऊँ कैसे

ग़ज़ल
हाथ मेरे हैं बँधे हाथ मिलाऊँ कैसे।
पास होकर भी तेरे पास मैं आऊँ कैसे।।

मेरे अंदर भी मचलता है समंदर लेकिन।
तेरे होठों की अभी प्यास बुझाऊँ कैसे।।

वक़्त ने डाल दी ज़ंजीर मेरे पैरों में।
दौड़कर तुझको गले यार लगाऊँ कैसे।।

ज़ह्र आलूदा मेरे हाथ हुए हैं हमदम

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उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं

 

ग़ज़ल
उजालों में किसी को कब कहां हम याद आते हैं।
चराग़ों के लिए तो बस अंधेरों में जलाते हैं।।

वो अपनी दोस्ती और दुश्मनी का हक़ अदा करते।
बढ़ाते हौसला भी है कभी मुझको गिराते हैं।।

खड़ी करते तो हैं वो रोज़ ही दीवार नफ़रत की।
मगर हम उसमें दरवाजा मुहब्बत से ब

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गीतिका

स्वयं की हानि करनेसे अधिक उन्माद क्या होगा
जहां अग्नि हो जिह्वा पर...वहां संवाद क्या होगा

जहांपर न्याय की कुर्सीका हो अन्याय अधिकारी
वहां पर तर्क क्या होंगे.…वहां प्रतिवाद क्या होगा

हसें...बोलें...उठें...बैठें....भुला कर भेद भावों को
धरा की गोद से विस्तृत

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ग़ज़ल

लगाएं आहटों पर कान कब तक
न तोड़े दम भला इमकान कब तक

फरिश्ता हो तो कोई बात भी है
लड़े दुनिया से इक इंसान कब तक

मेरी आँखों में पढ़ लेंगे तुम्हें सब
छुपाओगे भला पहचान कब तक

मैं अक्सर पूछता हूँ धड़कनों से
न छोड़ोगी मेरी तुम जान कब तक

चलो अब जुगनुओं को दोस्त कर लें
सहे

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ग़ज़ल

जब से आया फसाद छंदों में
भर गया है मवाद.....छंदों में

सुन के आते हैं..दाद में आंसू
है बहुत आर्तनाद......छंदों में

इनको तो...निर्विवाद रहने दो
क्यों मिलाते हो..वाद छंदों में

कोई आये कबीर..या दिनकर
फूंक जाए निनाद......छंदों में

गीत ग़ज़लें हों.....शेर या दोहे
कब

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महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है

ग़ज़ल

महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है।
अब इसकी मुहब्बत में हर ज़ुल्म ग़वारा है ।।

इक तुम ही अकेले तो हक़दार नहीं इसके।
ये जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा है।।

हम शान तिरंगे की कम होने नहीं देंगे।
ये ज़ान भी दे देंगे होगा जो इशारा है।।

जो देख रहे हैं हम ये

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वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है

ग़ज़ल
वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है।
कमाल फिर भी तो ख़ुद को ज़हीन कहता है।।

ज़माना उसके लिए महजबीन कहता है।
वो ख़ुद को फिर भी तो पर्दा नशीन कहता है।।

कहें जो सच तो है मुमकिन ज़बान साथ न दे।
मगर वो झूठ बहुत बेहतरीन कहता है।।

है टूटना इसे इक दिन ज़रुर

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2 Replies · Reply by Anish Shah Mar 3

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