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अच्छी शाइरी-4 Fahmi Badayuni

 

02 nov2019
------अच्छी शाइरी---4
आइए अब final episode पर आते हैं।
दोस्तो शाइरी बिल ख़ुसूस ग़ज़ल की शाइरी इशारों
कना यों और तशबीह(simly) का फ़न है इस का अहम ज़ेवर इस्तिआरे यानी mataphors है
इस्तिआरे का मानी उधार लेना है यानी हम किसी लफ्ज़ का मफ़हूम किसी दूसरे ल

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अच्छी शायरी 1 - Fehmi Badayuni

3688967323?profile=RESIZE_710x----अच्छी शाइरी-------(1)
-----------------------अच्छी शाइरी क्या होती है इसका फ़ैसला करना बहुत मुश्किल है बड़े बड़े दानिश वरों औऱ नाकिदों ने मुख़्तलिफ़ तरीक़ों से अच्छी शाइरी की तारीफ़ की है इनसे कोई एक ऐसा नतीजा निकालना जो सब को क़ुबूल हो नामुमकिन सी बात है

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2 Replies · Reply by shahab uddin shah Nov 1, 2019

अच्छी शाइरी-3 Fahmi Badayuni

01 nov2019
---------अच्छी शाइरी----3
पिछली दोनों क़िस्तों पर दोस्तों के comments से ज़ाहिर है कि उन्हें ये गुफ़्तगू अच्छी लग रही है और वो इस से कुछ नई चीजें सीख रहे हैं एक बात मैं ज़रूर कह ना चाहता हूँ कि मैं ने बड़े शायरों को ज़रा अलग ढंग से पढ़ा है ये नहीं

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अच्छी शायरी 2 - Fehmi Badayuni

3688967323?profile=RESIZE_710x

 

 

31 oct 2019
-------अच्छी शाइरी-2------
पिछली क़िस्त जदीद और रवायती शाइरी के फ़र्क़ पर मबनी थी ये फ़र्क़ ग़ैर ज़रूरी है बक़ौल अमीर इमाम
तर्ज़ ए इज़हार यानि crafting का रोल बहुत अहम है ।
शेर कहते वक़्त पहला step बहर वज़्न रदीफ़ क़ाफ़िया और दूसरे अरूज़ी लवाज़ मात हैं इ

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2 Replies · Reply by Sangharssh Oct 31, 2019

यूँ तो तमाम लोग हमारे रक़ीब हैं।

यूँ   तो    तमाम   लोग   हमारे   रक़ीब   हैं
हम क्यों पता करें कि वो किसके क़रीब हैं।

पाला   नहीं  है  हमनें  कोई  भी  मुग़ालता,
अपने  सिवाय   और   यहाँ   अंदलीब  हैं।

माँगी  नहीं  है  आपसे  इमदाद  कोई  भी,
इज़्ज़त  से  पेश  आइये,  माना  ग़रीब  हैं।

ये क्य

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2 Replies · Reply by Akhtar Ansar Kidwai Oct 30, 2019

ज़मीन

             ज़मीन

स्व.पं.प्रदीप से एक बार किसी ने पूछा था कि अगर दो रचनाकारों के ख़याल आपस में टकराते हैं तो क्या ये ग़ल़त बात है ? उन्होंने जवाब दिया कि कभी-कभी एक रचनाकार की रचना में शामिल सोच दूसरे रचनाकार को इतनी ज़्यादा अच्छी लगती है कि वह सोच के

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परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ु

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हर सिम्त उजालों से पुरनूर नज़र आये

ग़ज़ल
हर सिम्त चराग़ों से पुरनूर नज़र आये।
ये रात अमावस की पूनम सी निख़र आये।।

अपनी भी तमन्ना है इस बार दिवाली में।
इक दीप लिये अपनी छत पर भी क़मर आये।

नफ़रत के अंधेरों से आज़ाद वतन कर दे।
ये ज़श्ने चराग़ा अब लेकर वो सहर आये।।

करना तू करम या रब इस साल दि

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वो मुन्तज़र भी है

वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी
हुआ है वो इन्तिहा ख़फ़ा क्या

जो मेरी सूरत से मुन्क़बिज़

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