All Posts (244)

थक गया था तू बहुत फिर भी न हारा शुक्रिया
तेरी हिम्मत ने दिया हमको सहारा शुक्रिया

पास कुछ भी तो नहीं था जो कि दे पाते तुझे
तेरी सुहबत में हुआ फिर भी गुजारा शुक्रिया

ख़्वाहिशें पूरी हमारी हो सकें इसके लिए
इक न इक तू तोड़ देता है सितारा शुक्रिया

हो गया दीदार

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एक शिकवा है ज़िन्दगी से मुझे
छीन ले जाएगी मुझी से मुझे

बेख़याली का इक ख़्याल हूं मैं
कौन अपनाएगा ख़ुशी से मुझे

मुझको ख़ुद्दार कर गयी यारो
प्यार है तब से मुफलिसी से मुझे

इस बुढ़ापे में इन्तहा डर है
मेरे अपनों की बेरुख़ी से मुझे

मैं उसे वो मुझे न छोड़ेगी
इश्क ह

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ग़ज़ल

बड़ी बेखबर हूँ, हक़ीक़त बता दूं,
तुझे ज़िन्दगी अब कहाँ से सदा दूँ,

चमकती है बिजली सी ख़ामोशियों में,
अभी मैं भला कैसे घर को सजा दूँ

बहुत उम्र गुज़री अजब तीरगी में,
ये जी चाहता है कि दामन जला दूँ,

यहां मेरा अंदाज़ सब से जुदा है,
तो अंदाज तुझको नई क्या हवा दूँ,

तबीयत

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मुसीबत आपने भी मोल ली क्या
किसी  नादान से  की दोस्ती क्या
 
न जाने क्यों कोई सहमत नहीं है
बहुत मुश्किल हुई है रहबरी क्या
 
चलो  इक  प्यार का  मक़्तब बनाएं
मुहब्बत की नहीं खलती कमी क्या
 
तलाशे   जा  रहे  जुगुनू  जहां पर
चिरागों  में   नहीं  है  रौशनी क्या
 
अकेल
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212 212 212 212

जब से ख़ामोश वो सिसकियां हो गईं ।
दूरियां प्यार के दरमियाँ हो गईं ।।

कत्ल कर दे न ये भीड़ ही आपका ।
अब तो क़ातिल यहाँ बस्तियाँ हो गईं ।।

आप ग़मगीन आये नज़र बारहा ।
आपके घर में जब बेटियां हो गईं ।।

कैसी तक़दीर है इस वतन की सनम ।
आलिमों से खफ़ा रोटिय

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चन्द घड़ियां बवाल करती हैं
और सदियां मलाल करती हैं

फ़क़्र है हमको इस बुढ़ापे में
बेटियां देखभाल करती हैं

शक्ल पर वक़्त की लकीरें भी
आइने से सवाल करती हैं

बिन कहे भी हमारी ख़्वाहिश का
सिर्फ़ मांएं ख़याल करती हैं

हद से बेहद हुयी तमन्नाएं
हौसला ही निढाल करतीं है

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थकन के बाद भी चलते रहो इसरार करती हैं
मुझे बैसाखियां मेरी बहुत लाचार करती हैं

कभी हालात लमहे में बदलते हैं ज़माने के
कभी सदियां किसी अंजाम से इन्कार करती हैं

कभी कुछ सूरतें पत्थर बनी सी देखते रहिए
कभी कुछ पत्थरों में सूरतें इज़हार करती हैं

ख़ताएं माफ़ करता

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212 212 212 212

जब से ख़ामोश वो सिसकियां हो गईं ।
दूरियां प्यार के दरमियाँ हो गईं ।।

कत्ल कर दे न ये भीड़ ही आपका ।
अब तो क़ातिल यहाँ बस्तियाँ हो गईं ।।

आप ग़मगीन आये नज़र बारहा ।
आपके घर में जब बेटियां हो गईं ।।

कैसी तक़दीर है इस वतन की सनम ।
आलिमों से खफ़ा रोटि

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دکھ dukh

मैं सुनाऊं किसे हयात का दुख
मेरे अंदर है कायनात का दुख

میں سناؤں کسے حیات کا دکھ
میرے اندر ہے کاینات کا دکھ
वस्ल में दिन गुजारने वाले
हिज्र में मुझसे पूछ रात का दुख

وصل میں دن گزارنے والے
ہجر میں مجھ سے پوچھ رات کا دکھ

कौन हूं क्या हूं किसलिए हूं मै
मुझको

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दस्तयाबी को झुका जर्फ़े शजर तो देखिये
बर्ग के पर्दे में पोशीदा समर तो देखिये

तितलियों के रंग से अत्फ़ाल खौफ़ आलूद हैं
मज़हबी तालीम का उनपर असर तो देखिये

मुतमइन है मंज़िले मक़्सूद मिल ही जायेगी
उस मुसाफ़िर का ज़रा अज़्मे सफ़र तो देखिये

कद्द ओ कामत की बिना पर आँकिय

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221 2121 1221 212
मुद्दत के बाद आई है ख़ुश्बू सबा के साथ ।
बेशक़ बहार होगी मेरे हमनवा के साथ ।।

शायद मेरे सनम का वो इज़हारे इश्क था ।
यूँ ही नहीं झुकी थीं वो पलकें हया के साथ ।।

वो शख्स कह रहा है मुझे बेवफ़ा सुनो ।
जो ख़ुद निभा सका न मुहब्बत वफ़ा के साथ ।।

माँगी

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चाँद पर उभरी निशानी देखिए
फिर हक़ीक़त नागहानी1 देखिए

क़ैद कर लेती हैं दुनिया आँख में
पुतलियों की बेकरानी देखिए

आपने मेरी हँसी तो देख ली
अब मेरी आँखों में पानी देखिए

छोड़िए ना आँसुओं का चीखना
आप मेरी बेज़ुबानी देखिए

मुस्तहक़2 हैं ख़्वाहिशें जो आपकी
ख़्वाब भी तो जा

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Ek Khwab Si Ladki


काश इतने ग़म मिलें हमको कि ज़ाया कर सकें
शायरी पर हम भी थोड़ा खुल के ख़र्चा कर सकें

और तो कोई दुआ मांगी न हमने ऐ ख़ुदा
बस अता कर ये हुनर ग़ज़लें हम इंशा कर सकें

हो गए जब दूर तुम से और ख़ुदा से उसके बाद
कोई ऐसा है नहीं जिसको कि सजदा कर सकें

ज़िंदगी उ

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जिसे देखकर ख़ल्क़ हैरतज़दा है
वो इंसान अपने ख़ुदा से ख़फ़ा है

किनारों से मिलकर जो दरिया चला है
समंदर के दिल तक वही जा सका है

मुहब्बत में अक्सर ये देखा गया है
कि जो हारता है वही जीतता है

चराग़ों से वो रौशनी छीनता है
गुमां ये अँधेरे को होता रहा है

मेरे हाल पर

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ग़ज़ल


212 1222 212 1222

एक साँस भी जबतक साहिबान बाक़ी है
ज़िन्दगी के परचे का इम्तिहान बाक़ी है

कितनी सच है ये दुनिया, कितनी सच है वो दुनिया
बस इसी पहेली का तो निदान बाक़ी है

डूबने से रुक जाये आज शाम को सूरज
उस परिन्दे की नभ में जब उड़ान बाक़ी है

रो पड़े हैं महफिल में फ

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शब्द बन बहता हुआ मृदु भावना का निर्झरण हूँ

गुनगुनाओ मैं तुम्हारे......गीत का पहला चरण हूँ

तुम बिना अस्तित्व का मेरे..भला अस्तित्व कैसा
प्राण तुम हो मैं तो केवल....देह रूपी आवरण हूँ

जो सिंहासन को वचन वाणी की मर्यादा सिखाए
मैं मुखर जनशब्द हूँ.....मैं चेतना

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हर बार उसने बोला कि मेरा क़सूर है
मैंने भी सर झुका के कहा जी हज़ूर है।

मेरी वफ़ा के चाँद में भरपूर नूर है
उसके सबब से मेरी नज़र में सरूर है।

हर इक के दिल को जीते न इतनी भी ख़ूबियाँ
हाँ भूल भी न पाओगे इतना ज़रूर है

जब मैं ज़मीं पे थी तो मेरा चाँद पास था
और अ

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ये हादिसा भी किसी दिन ज़रूर होना है।
मैं आइना हूँ मुझे चूर चूर होना है।।

बहुत क़रीब रहूँगा तो ग़म बहुत होगा।
मैं जानता हूँ मुझे उससे दूर होना है।।

मेरे ख़ुदा मुझे अन्दाज़े-सादगी दे दे।
बतौरे-ख़ास किसी के हुज़ूर होना है।।

कहाँ उन आँखों का नश्शा, कहाँ तेरा नश्श

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खेल

एक ग़ज़ल.......

देने लगा सुरूर ये तन्हाइयों का खेल
भाया ज़रा न हमको पज़ीराइयों का खेल

जिस रात में न चाँद, न तारे थे बाम पर
बहला रहा था, दिल मेरा, परछाइयों का खेल

सच पर सफेद झूठ का होने लगा गुमाँ
खेला कुछ ऐसा झूठ ने सच्चाइयों का खेल

रुख़ पर नक़ाब अपने फ़रिश्

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एक   दीवाना   आब  लिखने   लगा।
सारा  आलम  चनाब   लिखने लगा।

मैंने  लिक्खे  थे  कुछ  सुकून के पल,

और   वो  इज़्तिराब   लिखने   लगा।

एक    भँवरे    से   दोस्ती   के   बाद,

मैं  भी  केवल  गुलाब  लिखने  लगा।

ज़ुल्मत-ए-शब   तो   बढ़  गई   होती,

पर   कोई   आफ़ताब  लि

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