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ब्लॉग ग़ज़ल

ग़ज़ल
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है मंज़ूर हमको जो चाहे सज़ा दो
मगर इल्तिज़ा है ख़ता तो बता दो

ज़रा ज़ुल्फ़ अपनी हवा में उड़ा दो
दिलों पर मुहब्बत के सावन लुटा दो

हमें तीरगी रास आती नहीं है
कहाँ छुप गए हो झलक तो दिखा दो

यही ज़ख़्म भरने की सूरत हो शायद
दवा हो चुकी हो सके तो दुआ दो

हमे

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मैं तो था ही मेरा हौसिला भी रहा
ग़म के सौदे में अपने ख़ुदा भी रहा

एक था वक़्त ऐसा के मैं ख़ुद मेरी
जब नज़र में भी था गुमशुदा भी रहा

किर्चें सपनों की मेरे उड़ीं ता’फ़लक़
हाँ रहा मैं भी और आईना भी रहा

मेरी बर्बादी में मेरी जाने ग़ज़ल
हाथ जो भी थे उनमें तेरा भी रहा

जीत अ

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किसी को भुलाने में

किसी को भुलाने में बरसों लगे
हमें मुस्कुराने में बरसों लगे

उठा हुस्न से एक पल ही नक़ाब
निगाहें हटाने में बरसों लगे

निगाहें मिलीं बस यूं ही मोड़ पर
उन्हें ढूंढ लाने में बरसों लगे

जलाया तेरा एक ख़त रोज़ ही
सभी ख़त जलाने में बरसों लगे

बड़ी मुश्किलों से ये राहें बनीं

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सामने जज़्बात का आंचल पसारा रख दिया
तुमने जब चाहा हमें पहना उतारा रख दिया

हाथ में उसके जो हमने दर्द सारा रख दिया
एक पल उसने न काग़ज़ को निहारा रख दिया

डूबने के वास्ते इक जंग ही लड़नी पड़ी
बारहा तूफ़ां ने हाथों में किनारा रख दिया

दोस्त बा-सज़दा जहां भी था वहीं सर

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ग़ज़ल

फ़ैसले होते नहीं हैं, सिर्फ़ सूरत देख कर,
दिल न जोड़ा जाए हरगिज़, ऐश ओ इशरत देख कर,

बुत है, आदमक़द सही, तो पूजना क्यों कर उसे,
कुछ न सोचा झुक गया बस अपनी चाहत देख कर,

ग़ैर से वाबस्ता रहके, कौन रह पाया है ख़ुश,
जो हमेशा ही मिला हो, ज़ाती हसरत देख कर,

मुस्कुरा के आ

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गीतिका

गीतिका

सत्य घोलो आचमन में।
अन्यथा क्या है हवन में।।

 


युग ये दानवराज का है।
नीति है जिसकी दमन में।।

 


नृत्य बरखा कर रही है।
गीत हो जैसे पवन में।।

 


याद फि़र आया है कोई।
कुछ नमी सी है नयन में।।

 


क्यों अँधेरों से डरें हम।
चाँद तारे हैं गगन में।।

 


कोई मन में यूँ सम

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ग़ज़ल

ग़ज़ल


एहले दानिश को पता क्या, क्या है पागल का मिज़ाज।
संगबारों को है कब मालूम, घायल का मिज़ाज।।

 

किस तरफ़ से है गुज़रना, और बरसना है कहाँ।
बस हवाओं को पता रहता है बादल का मिज़ाज।।

 

मेरे सर पर रह के भी, मुझ पे न साया कर सका।
मेरी क़िस्मत से कहाँ मिलता है आँ

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दिल की महफ़िल में वो आएँ तो ग़ज़ल हो जाए
रुख़ से चिलमन वो उठाएँ तो ग़ज़ल हो जाए

उनके होंटों के गुलाबी वो लरज़ते मिसरे
मेरे अशआर बनाएँ तो ग़ज़ल हो जाए

उनकी ख़ुशबू का है़ चर्चा यहाँ हर सू यारो
मेरे गुलशन में समाएँ तो ग़ज़ल हो जाए

मेरे अल्फ़ाज़ न पँहुचे हैं

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

बताऐं तो ज़रा  सी बात  थी क्या ।
भड़क जाऐंगे यूँ ही आप भी क्या ।

समझ आए न जब है तिश्नगी क्या ।
करेगा ऐसे में फिर आदमी क्या ।

जो बिगड़ी बात आए दौड़कर तुम ,
कहो तुमने कभी मेरी सुनी क्या ।

दिवानावार भंवरे डोलते हैं ,
कली कोई बग़ीचे में खिली क्या ।

सभी

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ग़ज़ल

ग़जल ..रत में है कैसी सरगम।

आँखें हैं पुरनम पुरनम।।

 

आँधी ने क्या जु़ल्म किया।

शाख़ें करती हैं मातम।।

 

तेरा मेरा क्या रिश्ता।

इक सूरज है इक शबनम।।

 

वक्त ने ऐसी करवट ली।

'मै' में बदला जज़्बा ए हम।।

 

उसके आने की उम्मीद।

शम्अ की लौ मद्धम मद्धम।।

 

दस्तक , आहट कुछ

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ज़िन्दगी कैसे कटे ऐ ज़िन्दगी तेरे बग़ैर
दिल्लगी करने लगी है हर ख़ुशी तेरे बग़ैर

कोशिशें मैंने बहुत कीं दम पे सूरज के मगर
हो नहीं पाती है घर में रौशनी तेरे बग़ैर

तेरा चेहरा देखकर ही फूल खिलते थे जहाँ
उस चमन में है फ़सुर्दा हर कली तेरे बग़ैर

मेरे घर में टूटकर ब

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एक और ताज़ा ग़ज़ल

ग़ज़ल

कहाँ हैं संग फ़लक पर उछालने वाले ।
समुन्दरों से वो रस्ता निकालने वाले ।

यही है फ़िक्र कि ख़ुद ही बिखर न जाएँ कहीं ,
हरेक हाल में सब को सँभालने वाले ।

बहुत दिनों से अकेला उदास बैठा हूँ ,
कहाँ गए मुझे मुश्किल में डालने वाले ।

बदलते वक़्त के साँचे में

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ग़ज़ल

कई दिन से......वो मेरी सिम्त भी आया नहीं है
उसे मालूम है........अब मुझपे सरमाया नहीं है

शकर जिससे मैं लूं जिसको कटोरी भर कढ़ी दूं
यहां फ्लैटों में.........ऐसा कोई हमसाया नहीं है

हमेशा झूठ के संग रह........हुआ है ये भी झूठा
कि हमने सच को सच की सफ में बैठाय

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मुहब्बत

पहली मुहब्बत तो बस पहली मुहब्बत होती है।।
उसके बाद में इश्क़ महज़ इक फितरत होती है।।

दरिया और लहरों का रिश्ता चलता रहता है,
पर मैं उसको प्यार करूँ तो दिक्कत होती है।।

तुम उसके ख्वाबों में हो और वो और किसी के,
ऐसी इश्क़गिरी पर सबको लानत होती है।।

बातें वातें ब

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मुहब्बत

पहली मुहब्बत तो बस पहली मुहब्बत होती है।।
उसके बाद में इश्क़ महज़ इक फितरत होती है।।

दरिया और लहरों का रिश्ता चलता रहता है,
पर मैं उसको प्यार करूँ तो दिक्कत होती है।।

तुम उसके ख्वाबों में हो और वो और किसी के,
ऐसी इश्क़गिरी पर सबको लानत होती है।।

बातें वातें ब

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रात सोना माना है मुझे
ख़्वाब भी देखना है मुझे

ज़िन्दगानी तेरी धूप की
छाँव में भीगना है मुझे

आप ख़ुश हों तो मैं भी हँसूँ
ये अभी सीखना है मुझे

आदमी में ही इंसान है
बस उसे ढूँढना है मुझे

ज़िन्दगी इक पहेली है तो
अब इसे बूझना है मुझे

राबिते जोड़ने के लिए
उम्र भर टूट

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जमाने भर के रंजो गम से मैं आबाद रहता हुँ
मैं खुशियों की कतारों में भी सबके बाद रहता हूं

मुझे ये गम नहीं है के गमों से राब्ता क्यूँ है
ग़मो में भी मगर हर वक़्त मैं आबाद रहता हुँ।

हवाओँ से मुझे बस आज ये एक बात करनी है
बहारो से जो मिलता हुँ तो क्यों बर्बाद रहत

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कभी ऐसा भी हो के तुम मेरे ख्वाबों में आ जाओ
रख दो हाथ सीने पे मेरे दिल मे समा जाओ।

ये तन्हाई का आलम रात भर मुझपे गुजरता है
सजाओ सेज फूलो की मेरी बांहों में आ जाओ।

अधूरा आसमाँ रोता है मिलने को चाँन्दनी से
बनके महताब पूनम का मेरे जीवन में छा जाओ।

नदी झरनो के

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लाख बैठें वो कहीं छुपकर गुलाबों में
ढूँढ ही लेंगे उन्हें हम कल बहारों में
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चोट मजनूँ को लगे हो दर्द लैला को
अब कहाँ वो प्यार के किस्से किताबों में
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पास

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अच्छा सा कोई शे'र सुनाओगे आज क्या
दीवाना मुझको फिर से बनाओगे आज क्या
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निकले हो देखने कि टपकता है कैसे घर
मेरे ग़रीबखाने पे आओगे आज क्या
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लिखकर रखा

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