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ग़ज़ल

ग़ज़ल

यूँ ख़ुद को ग़म की नदी में डुबो दिया हमने ।
सुकूनो-चैन मुहब्बत में खो दिया हमने ।

सुनाया ख़ूब मगर उसने जब सुना ही नहीं ,
तो दिल का दर्द ग़ज़ल में पिरो दिया हमने ।

हमारे ग़म की थी कीमत कहाँ ज़माने में ,
फ़िज़ा को अश्क़ों से अपने भिगो दिया हमने ।

दिलों

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति...ग़ज़ल

मुहब्बतों का ज़मीं आसमान माँगते हैं।
अजीब जज़्बे है सारा जहान माँगते है।।

जो धूप बन के जलाते थे ज़र्रे ज़र्रे को।
हुई जो शाम तो अब सायबान माँगते हैं।।

तअल्लुका़त की जिन को न थी कभी परवा।
वो आज रिश्तों का क्यूँ खा़नदान माँगते हैं।।

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अब वो इससे ज़ियादा मुझको क्या देगा
फ़िर वो मुहब्बत में मुझको धोखा देगा

उम्मीद नहीं मुझको जमाने से कोई
ताउम्र मेरा साथ मेरा साया देगा

आया था मोहल्ले में मसीहा बनकर
इल्म किसे था चिंगारी भड़का देगा

हर रोज निकलती हूँ मैं कुदाली लेकर
कोई न कोई पर्वत तो रस्ता दे

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

बीनाई को कोई यूँ रस्ता देगा।
अश्क बहा कर आँखों का सदका़ देगा।।

मजबूरी बन जाये वफा़दारी जिस दम।
ऐसे हाल में क्या कोई धोका देगा।।

फि़र आँगन में रक़्स करेगी तन्हाई।
वक़्त मुझे फिर से गुज़रा लम्हा देगा ।।

बादे सबा खु़शबू खु़शबू हो जायेगी।
फू़ल खु

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ग़ज़ल

ज़िन्दगी   की  राह   यह  मुश्किल बड़ी है,
हर क़दम पर इक न इक उलझन खड़ी है।

बारहा   छू   कर   गुज़रती   है   क़ज़ा  यूँ,
ज़िन्दगी   भी   और   जीने   पर  अड़ी है।

हो   गयी   है   इंतिहा   शायद   ग़मों   की,
यूँ   नहीं  आँखों  में  अश्कों  की  लड़ी है।

खेल।  है   ये 

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जो तू मिला तो बेसबात ज़िन्दगी ठहर गयी
खफ़ा हुआ जो तू हमारी ज़िंदगी बिखर गयी

हमारे हौसलों से मौत हार मान कर गयी
वो छू के लौट कर गयी तो ज़िंदगी सँवर गयी

बड़ी अजीब सी कशिश है तेरी नफ़रतों में भी
न तू ने क़ैद ही किया न तो रिहा ही कर गयी

अमान पर न हो ख़मी किसी की

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ग़ज़ल

गज़ल

चराग़ ए दिल बुझा के वक़्फ़ ए ताक़ कर दिया गया।
हमारी साँस साँस को मजा़क़ कर दिया गया।।

खु़शी के साज़गार लम्हे उस को नागवार थे।
मुहब्बतों में पैदा यूँ निफा़क़ कर दिया गया।।

ये दिल की धड़कनों में कैसी आ गयी है तमकनत।
जो जि़न्दगी का सिलसिला सियाक़ कर

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ग़ज़ल -

सलाम भी क़ुबूल है पयाम भी क़ुबूल है ।
नवाज़िशेें क़ुबूल इंतक़ाम भी क़ुबूल है।।

जो ग़म दिये हैं ज़िंदगी ने दी ख़ुशी भी तो बहुत।
सहर क़ुबूल है मुझे तो शाम भी क़ुुबूल है।।

भटकते दर ब दर तुम्हारे मयक़दे में आ गए।
सुकून की तलाश थी ये जाम भी क़ुब

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ग़ज़ल
वो दोस्त इसलिए तो सँभाला नहीं गया।
इक साँप आस्तीन में पाला नहीं गया।।

देखी लगा के खूब मुहब्बत की भी गुलाल।
पर उसके दिल से रंग तो काला नहीं गया।।

सहना पड़ा है दर्द हमे इसलिए जनाब ।
काँटे से काँटा हमसे निकाला नहीं गया।।

पुरनूर उनके हुस्न से ये घर था इस

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 ग़ज़ल 

 

दिल  से तो सबने निकाला है हमको
आँखों  ने  तेरी   संभाला  है   हमको

हर  इक  तरफ़  से  अंधेरा है  आता
जानिब  से  तेरी  उजाला  है हमको

हंसते  जो  रहते  तो  उठ  कैसे  पाते
आंसू  ने  ऊपर   उछाला  है   हमको

कहने  को  तो  है  वही  कच्ची  रोटी
हाथों  से  त

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अदल बातों को कहकर झूठ टाला जा रहा है
अदालत में भी अब सिक्का उछाला जा रहा है

तशद्दुद इंतिहा तक के लिए होनी थी लेकिन
इसे अब इब्तिदा पर ही सँभाला जा रहा है

करें हम किस तरह ताबीर तय ख़्वाबों की अपने
मुनासिब हल अभी इसका निकाला जा रहा है

तुम्हें ये ज़ुल्म करके

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का़फि़ये पर ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

जब सदफ़ से किसी मोती को निकाला गया है।
डूब कर पहले समन्दर को खंगाला गया है।।

हमने तकरार का मौका़ कभी आने न दिया।
उम्र भर खु़द को तेरे साँचे में ढाला गया है।।

हसरतों को भी सजा कर रखा दिल में हमने।
आरजू़ को भी बहुत नाजो़ं से पाला गया है।।

अपने ह

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और सुनायें कैसे हैं
जेब में पैसे वैसे है ?

वो हैं जैसे के तैसे
हम बस ..जैसे तैसे.. हैं

उस का हुस्न अशर्फ़ी है
बाकी सब दस पैसे हैं

हम प्यासे हैं जन्मों के
उस के बोसे मय से हैं

उस के जैसे यार कहाँ
कुछ ऐसे .. कुछ वैसे हैं

उस के पाँव की धूल हैं धूल
हम क्

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ग़ज़लदिया तूने क़लम मुझको तो अब अल्फ़ाज़ भी दे दे।ज़बाँ बख़्शी है जो तूने तो अब आवाज़ भी दे दे।।यक़ीनन मेरी मंज़िल भी मुक़र्रर कर रखी होगी।मुकद्दर में लिखा अंज़ाम तो आग़ाज भी दे दे।।बड़ा है आसमाँ तेरा मेरी छोटी उड़ानें है।दिये जो ख़्वाहिशों को पंख़ त
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सोमवासरीय ग़ज़ल


गोरे   हैं  वो  काले  भी  हैं,   हैरत है!
दो  किरदार सँभाले भी हैं,   हैरत है!

शाम-सवेरे  जो हँस-हँस के मिलते हैं
मैल  दिलों  में  पाले  भी हैं,   हैरत है!

इज़्ज़त  घट  जाती  है इज़्ज़त देने से
ऐसा  कहने  वाले   भी   हैं,   हैरत है!

मौक़ा  द

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दर्द सबका जहाँ में सुना कीजिए,
जो दवा सी लगे वो कहा कीजिए !!

किस तरह दूर होंगी शिकायत सभी,
ज़िन्दगी से ज़रा मशविरा कीजिए !!

हर ख़ुशी को गले से लगाते हैं,
रूबरू ही ग़मों से मिला कीजिए !!

ज़िन्दगी का मज़ा ले रहे हैं मगर,
मौत से बा-ख़बर ही रहा कीजिए !!

ये जर

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ज़िन्दगी

....

इस क़दर कुछ यार मुझसे बाज़ आई ज़िन्दगी
ख़ुदकुशी पर देने आयी है बधाई ज़िन्दगी

सच तो ये है मयक़शी के बाद भायी ज़िन्दगी
यार तौबा जब भी की तो लड़खड़ायी ज़िन्दगी

और क्या है सिर्फ़ .. साँसों की लड़ायी ज़िन्दगी
ज़िन्दगी भर जान दे कर ही कमायी ज़िन्दगी

शौक़

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ग़ज़ल

आदमी ने शौक़ में यूँ ही लुटाई ज़िन्दगी,

थी सिरहाने पे कज़ा तो याद आई ज़िन्दगी,

 

शख़्स इक वो जानता है ज़िन्दगी के मायने,

मौत से लड़ लड़ के है जिसने बचाई ज़िन्दगी,

 

मैं पुजारी मानता था ज़िन्दगानी को मगर,

काटती है ख़ुद जो है ऐसी कसाई ज़िन्दगी,

 

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Filbadeeh ghazal

ग़ज़ल

क्या ख़ुदा ने खूब हम सबकी बनाई ज़िंदगी.
बेटियों की तर्ह दी हमको पराई ज़िंदगी.

जब कभी ग़म की हवा से डगमगाई ज़िंदगी.
हौसला छोड़ा नहीं और खुद सजाई ज़िंदगी

राजा महराजाओ वाली बादशाई ज़िंदगी.
याद आती है बहुत वो इब्तिदाई ज़िंदगी.

एक आना भी न अपने पर लुटाई ज़

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फ़िलबदीह ग़ज़ल

ग़ज़ल सच तो ये है हमको बिल्कुल भी न भाई ज़िन्दगी ।फिर भी अपने काँधों पर हमने बिठाई ज़िन्दगी ।लाख कोशिश की न फिर भी काम आई ज़िन्दगी ।आख़िरश फुटपाथ पर हमने बिछाई ज़िन्दगी ।ज़िन्दगी भर ज़िन्दगी से हमने आख़िर जंग की ,उम्र भर करती रही यूँ हाथापाई ज़िन्दगी
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