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Filbadeeh Ghazal

कह सकें अपना जिसे ऐसा बचा कोई नहीं.

रहने का इस शहर में अब फायदा कोई नहीं..

 

इश्क़ ने छोड़ा है ऐसी राह पर लाकर मुझे.

दोस्त दुनिया में मेरा मेरे सिवा कोई नहीं.

 

गाँव जाकर उसके देखोगे करिश्मा ये भी एक.

चांद चेहरे हैं वहाँ सब सांवला कोई नहीं.

 

रुकवा के बाइक मु

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ग़ज़ल

 

ज़िन्दगी पर बे वजह ही ज़ुल्म के इल्ज़ाम हैं
ज़िन्दगी जी आप जैसा मेहरबां है ही नहीं

ये मुक़द्दर हौंसला और है परों की आरज़ू
सब अलम ज़द हैं ज़मीं के आसमां है ही नहीं

नस्ले नौ को क्या दिया है हमने अपने शौक़ में
तेज़ है बादे सबा और बादबां है ही नहीं

दावे जानां

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मेरी उपस्थिति

झील का का मन्ज़र है साकित, बुलबुला कोई नहीं।

उसके एहसासात का अब आसरा कई नहीं

दीन ओ दुनिया का पता है और न है अपनी ख़बर।
इश्क़ से बढ़ कर जहाँ में सानेहा कोई नहीं।।

खुदकुशी करने की हमने खु़द ज़मीं तैयार की।
ख़्वाब के पैकर के जैसा जब मिला कोई

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नाम कुछ कुछ सुना-सा लगता है
कोई भूला खुदा सा लगता है

मेरी आँखें खुली रहीं तो कहा
मर के भी बेहया-सा लगता है

आज वो कुछ कहीं अलग सा है
दिल में कुछ तो हुआ-सा लगता है

लाख ग़ज़लें कहीं मगर फिर भी
दर्द बस अनकहा-सा लगता है

क्यूँ न चाहे हर एक शख़्स तुझे
तेरा सब कुछ अद

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 ग़ज़ल

गुलों को शाख़ से तोड़ो तो हाल मत पूछो
जवाब सुन न सकोगे सवाल मत पूछो

हर एक ज़ख़्म को मालूम है ख़ता उसकी
कि आख़िरश है इनहें क्या मलाल मत पूछो

अभी तो उड़ने लगा था ये दिल परों के बिना
ज़रा तुम उठ के चले और ज़वाल मत पूछो

थी खामियाँ मेरी जितनी भी सब बत

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ग़ज़ल

"किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है ।"
किसी का भी हो ये अच्छा बयान थोड़ी है ।

ढलकती उम्र है इतनी जवान थोड़ी है ।
बहुत हैं गर्म-ख़ूँ तुममें ही जान थोड़ी है ।

ज़ुबाँ को तुमने भी तलवार बना ही डाला ,
रबर की तेग़ है इस पर मियान थोड़ी है ।

मिलेगा तुमको सुक

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ग़ज़ल

 

मुफा़इलुन फ़इलातुन
मुफा़इलुन फेलुन (फ़इलुन)

मेरी उपस्थिति

ज़मी से अब्र का अन्दाज़ वालेहाना है।
चले भी आओ..! कि मौसम भी आशिका़ना है।।

खु़लूस, प्यार, मुहब्बत , वफा़ के जज़्बे से।
हमें ज़मीन पे जन्नत सा घर बनाना है।।

न जाने क्या हो अगर रुबरू वो आ जाये।
अभी

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ख़ुदी  से  प्यार  हमें  दाइमी जो करना है
तो मुश्किलात  से  होते  हुए  गुजरना  है

बहार  है  तो अभी जिस्म  को ख़ुशी दे दें
ख़िज़ां करेगी इशारा कि  अब  सुधरना है

मिले सहारा सफ़ीने का या कि तिनके का
हमें  किसी  भी  तरह  पार  तो  उतरना है

मिलेगा  रूह  को  आराम

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ग़ज़ल

ग़ज़ल :
غزل :

जो बेटी को डोली बिठाया गया।
मुझे छोड़ कर मेरा साया गया।

جو بیٹی کو ڈولی بتھایا گیا
مجھے چھوڑ کر میرا سایا گیا

मेरी कामयाबी का आलम है यूँ...
मेरा क़िस्सा मुझको सुनाया गया।

مری کامیابی کا عالم ہے یوں
مرا قصصہ مجھکو سنایا گیا

ख़मोशी मेरी जाँ न ले ले कह

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कब तक

तू निहारे सुब्ह से मुझको ही शब तक
नींद से भारी न हो पलकें ये जब तक

हौसले में तू बुलंदी रख हमेशा
ज़िन्दगी तुझको हराएगी भी कब तक

थक गया वो ढूँढ कर तस्वीर अपनी
मेरे बटवे में नहीं देखा है अब तक

मेरे अंदर का मुसाफ़िर खो गया है
ढूँढती हूँ दर-ब-दर उसको मैं

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हिंदी ग़ज़ल

हे  प्रिये  तुम ही  मेरे मन प्राण का आधार हो

प्रियतमा तुम ही मेरी हर श्वाँस का विस्तार हो

 

धूप में जीवन की इस जलते हुए तन पर प्रिये

प्रेम  का  चंदन  हो  तुम आनंद की बौछार हो

 

कितना एकाकी था ये जीवन तुम्हारे बिन शुभे

तुम  जो  आए  यूँ  लगा  जैसे कोई त्यौहार

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ग़ज़ल

 हिन्दी ग़ज़ल

जाना पहचाना मिला रस्ते में अनजान।
मन में इक विश्वास था वो लेगा पहचान।।

 

प्रेम-सुधा है शून्य से अब तक अंगीकार।
बस सपनों मे ही मिला उस से मुझ को मान।।

 

मिले आप अपनत्व से, ये मन हुआ अधीर।
भावों के अतिरेक का आया इक तूफा़न।।

 

जन्म जन्म के मूर्ख हम,

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ग़ज़ल

ग़ज़ल

हुनर पर भी हमारे ऐब की शमशीर चलती है।
हुकूमत उसकी लगता है कि आलमगीर चलती है।।

सुकूँ मिलता है दिल को ख़्वाब की बस्ती में हर लम्हा।
मगर उल्टी हमारे ख्वाब की ताबीर चलती है।।

कभी देखा था उसने मुझ को चाहत की निगाहों से।
नज़र के सामने अब तक वो ही तस्वीर चल

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Ghazal

मेरी ख़ातिर जो करवाचौथ का उपवास रखती थी. 

किस आसानी से उस लड़की ने शादी ग़ैर से कर ली.

 

महक जाती नहीं थी उँगलियों से देर तक जिसकी.

कहाँ बाज़ार में मिलता है अब वो शुद्ध देशी घी.

 

फ़क़त क़ारीगरी काफ़ी नहीं है इसमें लफ़्ज़ों की. 

ग़ज़ल की सीखनी पड़ती है ग्रा

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एक ग़ज़ल

चाकू खंजर आरी वारी लगती है।
मेरे क़त्ल की सब तैयारी लगती है।।
 
यूँ ही शब भर आहें भरते रहते हो।
इश्क़ की तुमको भी बीमारी लगती है।।
 
हर बोसे पर रिश्वत देनी पड़ती है।
यार, मुहब्बत भी सरकारी लगती है।।
 
इतने घूंट पिये हैं हमने आँसू के।
मुँह से निकली बात भी खारी लगत
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हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो

अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो

ज़रा- सा खोलकर रखना दरीचे
इधर आयी अगर बादे -सबा तो

सुलह का रास्ता मालूम तो है
नहीं माना किसी ने मशविरा तो

उसे ख़ामोश रहने की क़सम है
मगर नज़रो

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बे-आवाज़ी से इक रिश्ता टूट रहा है,
इस ख़ामोशी से इक लड़का टूट रहा है,

 

उसके सारे सपने इक दिन पूरे होंगें,
सो बस इस उम्मीद में तारा टूट रहा है,

 

कैसे मैं अपने जख़्मों को रफू करुँगा,
देखो मेरे प्यार का धागा टूट रहा है,

 

मौत भी शायद मुझसे नफ़रत करती होगी,
आये

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ग़ज़ल

तुझ में आ मिलना है, तेरा होना है
यानी इक क़तरे को दरिया होना है,
تُجھ میں  ملنا ہے، تیرا ہونا ہے،
یعنی اک قطرے کو دریا ہونا ہے

बैठा हूं अब ज़िद करके मैं शोलों पर,
या तो जलना है या सोना होना है,
بیٹھا ہوں اب زید کرکے میں شولوں پر،
یہ تو جونا ہے یہ سون

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किसी की भी ख़्वाहिश पे क़ुर्बान होना
है  मुश्किल बहुत इतना आसान होना

इसी  एक  ज़ज़्बे  पे  दुनिया  है क़ायम
मुहब्बत  में  दो  जिस्म  इक जान होना

लगी  होड़  इंसां  में  बनने  की  पत्थर
कि  जैसे  सभी  को  है  भगवान  होना

तेरे   आइने   को   भी   अच्छा  लगा ह

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