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ग़ज़ल इस्लाह के लिए

  1. ग़ज़ल
 
फूले-फलेंगे ज़ख्म सितमगर के आसपास
घर सोचकर लिया है तेरे घर के आसपास
 
जब काम  लीजिए तो' ज़रा एहतियात से
पैनी है' ये जुबान भी' खंजर के आसपास
 
हैं  ख्वाहिशें  उदास   जरूरत  के' सामने
शीशे का इक मकान है पत्थर के आसपास
 
मिट्टी से' मैं जुड़ा हूँ'  रखें  हैं जमी
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बेबसी


तोड़ देती है सभी को कैसे हाए बेबसी
अश्क़ सब के ये बहाए दिल जलाए बेबसी

सरहदों पर लड़ रहे हैं जो वतन के वास्ते
फ़िक्र बनकर उनकी माँओं को जगाए बेबसी

यार जब से छोड़ कर तन्हा गया मुझको यहाँ
हिज्र के गुल बाग में हर दिन खिलाए बेबसी

कर्ज़ में डूबा हुआ मज़दूर आख़िर क्य

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एक ग़ज़ल

फूल   से   ख़ार   से   ख़ाबों   से   बहुत   आगे  का।
मेरा   मज़मूं    है   सितारों    से   बहुत   आगे   का।

या तो मिल जाए मुझे अब किसी साहिल की पनाह,
या   तलातुम   हो   किनारो   से   बहुत   आगे  का।

इक   नई   पौध   वो   दे  देता  है   जब   मिट्टी  को,
पेड़   

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

गीतिका

जब बसंती रंग ले कर धरती से अम्बर मिला।
अपने प्राणों के लिये चिन्तित बहुत पतझर मिला।।

लेखनी के सूखे अधरों को भिगोयें किस तरह।
शब्द की संयोजनाओं से विमुख अक्षर मिला।।

उषा की रक्तिम छटा से ये हुआ आभास सा।
नव वधु से जैसे शुभ बेला मे उसका वर

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दोहा ग़ज़ल

 

वो  महकी  शेफालियाँ,कम हो गईं जनाब,
वो अमुवा की डालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

हाय  पश्चिमी  होड़  में ,गुम देसी परिधान ,
वो हँसली वो बालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

मँहगाई  के  दौर  में , फीके  सब  त्योहार,
वो होली - दीवालियाँ ,कम हो गईं जनाब।

 

इस विकास की दौड़ में,

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तेरी नज़रों से यूँ गिरे हैं हम
रेज़ा रेज़ा बिखर गए हैं हम

कभी मर्ज़ी से चलते फिरते थे
अब जहाँ रख दिया, रखे हैं हम

जो कभी तितलियाँ पकड़ता था
वो नहीं यार, दूसरे हैं हम

तज्रबे की तो कुछ करो वक्अत
माना कुछ कम पढ़े लिखे हैं हम

हम हैं तिनकों से भी गए गुज़रे
फिर जियें

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मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़

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बदन पर अब थकन तारी बहुत है,
ज़ईफ़ी  है,  तो     दुश्वारी  बहुत है।

मरज़ का म्यूज़ियम है जिस्म अब ये,
फ़ना  हों,   एक   बीमारी  बहुत   है।

जलाने  के   लिये   बस्ती  मुक़म्मल,
घृणा   की  एक  चिंगारी   बहुत  है।

वफ़ा  के  नाम पर हैं क्यों, सितम ये 
दिले-नाज़ुक  को  ला

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tues day pgm

ग़ज़ल

जाम से रग़बत न रक्खें, तर्क मयखा़री करें।
यूँ अदा साकी़ से हम रस्म ए वफा़दारी करें।।

शमअ की लौ थरथरा के हो गयी खु़द ही धुआँ।
अब अंधेरे जब तलक जी चाहे सरदारी करें।।

वक़्त, मुमकिन है, बदल दे ये निजाम ए जि़न्दगी।
खु़शबुएं काँटों की भी इक दिन तरफ़दारी

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हक़ीक़त हो गयी उसको पता तो
हुआ वो बेसबब हमसे ख़फ़ा तो

अँधेरे में कोई ग़फ़लत न करना
वहाँ भी देखता होगा ख़ुदा तो

ज़रा- सा खोलकर रखना दरीचे
इधर आयी अगर बादे -सबा तो

सुलह का रास्ता मालूम तो है
नहीं माना किसी ने मशविरा तो

उसे ख़ामोश रहने की क़सम है
मगर नज़रों से ह

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ग़ज़ल ( कुछ नहीं )

ग़ज़ल 

क्या हुआ कुछ नहीं,
ये ख़ता कुछ नहीं,

ज़िन्दगी से मिरा,
राब्ता कुछ नहीं,

जी लिया गम अगर,
फिर कज़ा कुछ नहीं,

दोस्ती में मिले,
वो सज़ा कुछ नहीं,

है अना गर तुझे,
आयना कुछ नहीं,

इश्क़ में जो हुआ,
हादसा कुछ नहीं,

बात है आपसी,
मामला कुछ नहीं,

बेवफा के लिए,
है वफ़ा क

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ग़ज़ल

 

अगर कहीं भी मिले मुहब्बत, ज़रा सा बचना सराब होगी
ख़ुशी से दूरी बनाये रखना, नहीं तो आदत ख़राब होगी

ये कैसे हमने शजर थे पाऐ कि ज़ीस्त भर सिर्फ ख़ार आऐ
जो तुम मिले तो लगा कि शायद, ये ज़िंदगी अब गुलाब होगी

वो सुरमई नीली आँखें पीछे, नक़ाब के क्या ग़ज

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ग़ज़ल

हमें ख़ुद को ख़ुद आज़माने की ज़िद है,
जहाँ को अक़ीदत जताने की ज़िद है,

ब दम टूट सकते हैं मरने की हद तक,
ये कूव्वत जहाँ को  दिखाने की ज़िद है,

मुहब्बत में झुकना,झुकाना अबस ही,
ये अहमक चलन है,बताने की ज़िद है,

अगर हमसे उल्फत है आजाओ खुद ही,
हमें भी, तुम्हें, नईं बुला

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Ghazal

मेरी एक ग़ज़ल :

वो मुझसे दूर है माना , मगर हर वक़्त मेरी है।
तसव्वुर में मिरे हर पल वो मेरे साथ होती है।

शब-ए-हिज्रां से डरते हो ,मुहब्बत क्या करोगे तुम?
फ़िराक़-ए-यार से यारों मुहब्बत और बढ़ती है।

अंधेरे रास्ते तुमको सतायेंगे बहुत लेकिन
जो तुम चलते गए इक रोशनी

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रुस्वा तुझे किया ही नहीं तेरे शह्र में
मैं तो कभी गया ही नहीं तेरे शह्र में

सुनते थे तेरे शह्र का पानी ख़राब है
सुनते हैं अब हवा ही नहीं तेरे शह्र में

बस तख़्तियों पे कागजा़ें पे नाम हैं लिखे
चेहरों का कुछ पता ही नहीं तेरे शह्र में

ख़ामोशियां हैं मौत सी फ़िज़ा

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ग़ज़ल

ग़ज़ल


है कैसा जुनूँ, वहशत है ये क्या, कुछ इसका सबब मालूम नहीं।
आँखों से बयाँ क्या होता है, क्या कहते हैं लब मालूम नहीं।।

 

ये बन्दे ग़रज़ के एहले हवस, क्या जाने वफ़ा के मतलब को।
जिस्मों से लगावट रखते हैं, ज़ेहनों की तलब मालूम नहीं।।

 

हर चीज़ अता की क़ुद

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मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़

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ग़ज़ल

ग़म से आरास्ता हूं मुस्कुराता हूं
तुम से आराम दिल का पाता हूं

सब्रो वाजिद पे है ये दीवाना
रुक्ने आहंग यूं निभाता हूं

सोज़ है और जुनूं के क़ाएद हैं
इस क़दर गीत गुनगुनाता हूं

तुम से नाराज़ हूं ये सच है पर
तेरी तस्वीर से निभाता हूं

शिक़वे कितने सजाए रखता हूं
साम

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Filbadeeh Ghazal

कह सकें अपना जिसे ऐसा बचा कोई नहीं.

रहने का इस शहर में अब फायदा कोई नहीं..

 

इश्क़ ने छोड़ा है ऐसी राह पर लाकर मुझे.

दोस्त दुनिया में मेरा मेरे सिवा कोई नहीं.

 

गाँव जाकर उसके देखोगे करिश्मा ये भी एक.

चांद चेहरे हैं वहाँ सब सांवला कोई नहीं.

 

रुकवा के बाइक मु

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