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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

कोई तो हो जो मिरी रूह में उतर जाये।
अन्धेरी रात के पैकर में नूर भर जाये।।

वो अपने साये में मुझ को छुपा के रख लेगा।
शजर से धूप की चादर ज़रा उतर जाये।।

मैं उसके क़ुर्ब की खु़शबू को भर लूँ दामन में।
गुज़रते वक़्त कह दो ज़रा ठहर जाये।।

इक आरज

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

नमी ढूँढोगे सहरा में कहाँ तक।
नहीं मिलता समन्दर का निशाँ तक।।

अना ने ख़ुदकुशी कर ली है शायद।
गई है तिश्नगी आब-ए-रवाँ तक।।

यहाँ फ़ाकाकशी रायज है हर सू।
नहीं उठता मकानों से धुआँ तक।।

बहुत सन्नाटा था धड़कन में दिल की।
ख़मोशी आ गई है अब बयाँ

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

हमने माना जि़न्दगी अच्छी नही
फि़र भी हरगिज़ खुदकुशी अच्छी नहीं।

ख़त्म कर दे आँख की बीनाई तक।
तेज़ इतनी रोशनी अच्छी नहीं।।

रख दो हर सू प्यार के रोशन चराग़।
जेह्न ओ दिल में तीरगी अच्छी नहीं।।

दिल में रख कर नफ़रतों के सिलसिले।
हम से यूँ वाब

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

उजाले जो इठला के गाने लगे।
अंधेरे भी घबरा के जाने लगे।।

जो नक़्श ए क़दम ढूँढते थे मेरा।
मुझे रास्ता वो दिखाने लगे।।

सितारों से करनी पडी़ दोस्ती।
मुझे रतजगे जब सताने लगे।।

अभी तो कोई बात हमने न की।
उठे आप, और उठ के जाने लगे।।

ज़रा उम्र की ध

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़जल

जब घिरी कश्ती मेरी वक्त ए सफ़र तूफ़ान में।
दे गया दरिया भी कुछ गिरदाब मुझको दान में।।

यूँ किताब-ए-इश्क़ की तहरीर यकसर मिट गयी।
तोली जाती है वफ़ा अब झूठ के मीज़ान में।।

मरतकज़ किरदार पर रहती है दुनिया की नज़र।
एक लम्हा चाहिये रुस्वाई के ए

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बशर को ढाई आखर का अगर सद्ज्ञान हो जाए
वही गुरुग्रंथ गीता बाइबिल क़ुर्आन हो जाए

मजाज़ी औ हक़ीक़ी का अगर मीज़ान हो जाए
मेरा इज़हार यारों मीर का दीवान हो जाए

जला कर ख़ाक करना, कब्ल उसके ये दुआ देना
कि मेरा जिस्म सारा ख़ुद ब ख़ुद लोबान हो जाए

ख़ुदा को भूलने वाल

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नीमवा आँखें तुम्हारी कह रही हैं वो कहानी
दरमियानी दूरियाँ जब कम हुई थीं नागहानी

मुब्तिला थी लौ दिये की साज़िशों में साथ तेरे
जो हमारी धड़कनों की कर रही थी तर्जुमानी

तेरे दिल की आहटें मुझको सुनाई दे रही थीं
और भरती जा रा रही थीं मेरे दिल में बदगुमानी

मैं

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ग़ज़ल

आंखें न यूँ झुकाइये इस्मे शबाब की
हमको भी हैं उम्मीदें तुमसे जवाब की

दांतो में यूं दबाना होंटो के आपका
शर्मा गई है देखिये पखरी गुलाब की

पढ़ते रहें उम्र भर आंखो से आंख हम
ताआ़रीफ खूब कीजिये(हूं) इस निसाब की

हमने जो किया है हक़ जानकर किया
हसरत कभी न की है हमन

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परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ु

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यूँ तो तमाम लोग हमारे रक़ीब हैं हम क्यों पता करें कि वो किसके क़रीब हैं। पाला नहीं है हमनें कोई भी मुग़ालता, अपने सिवाय और यहाँ अंदलीब हैं। माँगी नहीं है आपसे इमदाद कोई भी, इज़्ज़त से पेश आइये, माना ग़रीब हैं। ये क्या हुआ कि आज हुए हैं वो अश्कबार, कह तो यह

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वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी
हुआ है वो इन्तिहा ख़फ़ा क्या

जो मेरी सूरत से मुन्क़बिज़

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ग़ज़ल



दामन वो मुझसे अपना छुड़ा कर चले गए
कस्रे हयात ही मेरा ढा कर चले गए
उनका हुनर न पूछिए पल भर को मेरे पास
आए वो मुझसे मुझको चुरा कर चले गए
पर्दे की लाज अपनी बचाने के वास्ते
कल शब वो मेरे ख़्वाब में आ कर चले गए
शब के सिमटते लम्हे गवाही न दे सके
वो मुख़्तसर से व

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याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश किसकी है मेरी बस्ती में मालूम नहीं
दफ़्न कर

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हिंदी गीतिका

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,

हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,

जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?

प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से,
तब कहाँ सीमाएं

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हिंदी गीतिका

क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,

हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,

जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?

प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से,
तब कहाँ सीमाएं

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मशहूर क्या हुए कि वो मग़़रूर हो गये
अपनों से और ख़ुद सेबहुत दूर हो गये
 
जो ज़ख़्म दिये आपने रक्खे सम्हाल के 
गुज़रा जो वक़्त आख़िरश नासूर हो गये
 
कोशिश हजार की कि सम्हल जाए ज़िन्दगी 
लेकिन  तन्हा  सफ़र  था सो मंसूर हो गये
 
करता कहाॅ है वक़्त कभी माफ़  किसी
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भाई को भाइयों से लड़ाया न कीजिए
दीवार आँगनों में उठाया न कीजिए
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सम्मान जिस जगह न करे आपका कोई
ऐसी जगह तो भूल के जाया न कीजिए
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रुकने का नाम आज न बरसात ले र

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शम्स था जोकि

शम्स था जोकि सरपर खड़ा होगया
मेरा साया कहीं गुमशुदा होगया

एक रिश्ता था वोभी फ़ना होगया
उसको कुर्सी मिलीतो ख़ुदा होगया

तीरगी का असर इन्तिहा होगया
मेरा साया भी मुझसे जुदा होगया

उसने मेरी हक़ीक़त जता दी मुझे
यूँ लगा वो मिरा आइना होगया

मेरी माँ ने रखा हाथ सर पै

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जब अंधेरे को

जब अँधेरे को बेहद गुमाँ होगया
एक जुगुनू से आलम रवाँ होगया

लौट आये वहीं, थे जहाँ से चले
उम्र-भर का सफर रायगाँ होगया

हम चले,तुम चले,ये चले,वो चले
एक मंज़िल थी सो कारवाँ होगया

दबगया,बोझ इतना था अहसान का
एक दिन ये हुआ बेजुबाँ होगया

हम अचानक ही ज़रदार क्या‌ होगये

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ग़ज़ल -कुबूल है

1212 1212 1212 1212

शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।
ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।

नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।
लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।

गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह नकाब ।
जवां है धड़कने मेरी ये आशिकी क

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