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ग़ज़ल

 

ग़ज़ल

 

हमारे ठौर-ठिकानों  को ध्वस्त रखता है

हमें वो पाँओं के छालों में मस्त रखता है

 

हर एक मकाम पे हमको वो पस्त रखता है

मगर वो फिर भी  हमें आश्वस्त रखता है

 

हमारे गाँव के सूरज को अस्त रखता है

किसी तरह वो हमें अस्त-व्यस्त रखता है

 

हमारे रक्त से जलते हैं सब दी

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ग़ज़ल
दौर-ए-गर्दिश है अपने घर रहिये ।
दिल नहीं लग रहा मगर रहिये।।

दूर रहिये ज़रूर लोगों से।
हाल से सबके बा-ख़बर रहिये ।।

दुश्मने-ज़ां वबा है *कोरोना*।
बात डर की है पर निडर रहिये।।

सैर करिये न आप यूँ साहिब।
अब इधर रहिये या उधर रहिये।।

हाँ जरूरी हैं एहतियात भ

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ग़ज़ल
अभी तो इतना अंधेरा नज़र नहीं आता।
तो साथ क्यों मेरा साया नज़र नहीं आता।।

इन आंँखों से ये ज़माना तो देख सकता हूँ ।
बस एक अपना ही चेहरा नज़र नहीं ।।

कि एक अंधा अंधेरे में देख लेता है ।
मुझे उजालों में क्या-क्या नज़र नहीं आता।।

बँधी यक़ीन की पट्टी हमारी

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ग़ज़ल
आपका क्या है आप रो लेंगे।
और बेचैन हम तो सो लेंगे।।

आप जितना ज़ियादा बोलेंगे।
पोल अपनी ही आप खोलेंगे।।

बैठकर छेद गर करोगे तो।
आप कश्ती ही खुद डुबो लेंगे।।

आपको सब जबाब मिल जायें।
अपने दिल को अगर टटोलेंगे।।

मुझपे छीटे उछाल कर के अब।
आप बेदाग़ कैसे हो ले

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ग़ज़ल
हाथ मेरे हैं बँधे हाथ मिलाऊँ कैसे।
पास होकर भी तेरे पास मैं आऊँ कैसे।।

मेरे अंदर भी मचलता है समंदर लेकिन।
तेरे होठों की अभी प्यास बुझाऊँ कैसे।।

वक़्त ने डाल दी ज़ंजीर मेरे पैरों में।
दौड़कर तुझको गले यार लगाऊँ कैसे।।

ज़ह्र आलूदा मेरे हाथ हुए हैं हमदम

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ग़ज़ल
मेरे मौला मुझे ग़ुरूर न दे।
हो जुदा अपने वो फ़ितूर न दे।।

छाँव भी मिल नहीं सके जिससे ।
मेरे आंगन में वो खजूर न दे।।

शख़्स अदना लगे जहाँ से मुझे।
वो बुलंदी मुझे ग़फू़र न दे।।

तिश्नगी भी मिटे न प्यासे की।
वो समंदर मुझे हुजूर न दे।।

आज भाई रकीब भाई का।
यूं

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ख़ुद को हम दे के थपकी सुलाते रहे
बारहा ख़्वाब आ कर जगाते रहे

क़ब्र पर साथ अदू के वो आते रहे
दफ़्न करके भी मुझको जलाते रहे

इक ग़ज़ल जो कही थी तेरी शान में
उम्र भर हम उसे गुनगुनाते रहे

अश्क करते रहे यूँ ग़मों से वफ़ा
आ के पलकों पे बस झिलमिलाते रहे

बादे मर्ग आयेंगे

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ग़ज़ल

तेरी शोख़ी में कुदरत के ये सारे राज़ पलते हैं।
अदा तेरी जो बदले तो नज़ारे ख़ुद बदलते हैं।।

ज़रा दिल में उठे ज़ज़्बात का तूफां संभालो तुम।
ये मौज़ें सर पटकती हैं समंदर भी मचलते हैं।।

बहारें फिर से लौट आईं हैं इस वीरां गुलिस्तां में।
तेरे तेवर की लरज़

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ग़ज़ल

  • ग़ज़ल
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    वो नाबे दिलबरी अब क्यों यहां, साक़ी, नहींआती ,
    कुछेक दिल अब भी प्यासे हैं, मए यारी नहींआती।

    वो तो महवेकसीदः ख़्वानिये रुख़सारो काकुल है,
    ग़मे दौरां की, शाएर को तो आहट भी नहींआती।

    जहाँ हो बाग़बां ख़ुद ही किसी गुलचीं का कारिन्दः,
    फ़ुग़ां वां गोशे तूत

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ग़ज़ल

महबूब वतन मेरा ये आँख का तारा है।
अब इसकी मुहब्बत में हर ज़ुल्म ग़वारा है ।।

इक तुम ही अकेले तो हक़दार नहीं इसके।
ये जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा है।।

हम शान तिरंगे की कम होने नहीं देंगे।
ये ज़ान भी दे देंगे होगा जो इशारा है।।

जो देख रहे हैं हम ये

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ग़ज़ल
वो शख़्स दो को हमेशा ही तीन कहता है।
कमाल फिर भी तो ख़ुद को ज़हीन कहता है।।

ज़माना उसके लिए महजबीन कहता है।
वो ख़ुद को फिर भी तो पर्दा नशीन कहता है।।

कहें जो सच तो है मुमकिन ज़बान साथ न दे।
मगर वो झूठ बहुत बेहतरीन कहता है।।

है टूटना इसे इक दिन ज़रुर

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आज फिर अंतःकरण से रार कर लूँ
और थोड़ी देर तक मनुहार कर लूँ

शब्द जिह्वा पर किये हैं मौन धारण
दे सहज वाणी उन्हें साकार कर लूँ

हो सके तो आज रुक जाओ बटोही
जो तुम्हे भाये वही श्रृंगार कर लूँ

हर परिस्थिति में चला मैं सत्य पथ पर
इस परिष्कृत झूठ का प्रतिकार कर ल

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मैं दर को दीवार कर चुका हूँ
यक़ीन करिए सुधर चुका हूँ

यूँ ज़ाहिरन दिख रहा हूँ ज़िंदा
हक़ीक़तन कब का मर चुका हूँ

मैं बिन मुहब्बत हूँ एक बनचर
ख़ुद अपने माज़ी को चर चुका हूँ

कोई तआरीफ़ कर दे थोड़ी
बहुत ज़ियादा सँवर चुका हूँ

बहूँगा जब तो डरेगी दुनिया
मैं पी के आँसू यूँ

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बस एक ख़ता की जो, सौ बार सज़ा दोगे
इस तरह तो तुम मेरी, हस्ती ही मिटा दोगे

हालात से घबरा कर, जब मौत भी माँगूँगा
फित्रत है तुम्हारी ये, जीने की दुआ दोगे

ख़्वाहिश है तुम्हे अपना, हमराज़ बनाने की
डरता हूँ मुझे अपनी, नज़रों से गिरा दोगे

ताबीर की ख़्वाहिश में, कुछ

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नातवां है तू बहुत फिर भी न हारा शुक्रिया
तेरी हिम्मत ने दिया मुझको सहारा शुक्रिया

पास मेरे कुछ नहीं था जो कि दे पाता तुझे
तेरी सुहबत में हुआ फिर भी गुज़ारा शुक्रिया

ख़्वाहिशें पूरी हमारी हो सकें इसके लिए
इक न इक तू तोड़ देता है सितारा शुक्रिया

हो गया दी

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

कभी अहबाब से खाई, कभी झूठे खु़दाओं से।

हमेशा ज़क उठाई हम ने, अपने आश्नाओं से।।

अगर ईमान के गुलशन में, सच्चाई महकती हो।
बदलती देखी है तक़दीर , भी हम ने दुआओं से।

अभी कुछ देर पहले ही, तो खु़शबू गुल से निकली है।
मगर सरगोशियाँ करने लगा, सब्जा़

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अगर तुम राह में दो चार भी काँटे बिछा देते
हमारे पाँव के छाले तुम्हे कितनी दुआ देते

ख़ुदाया! तुम जो सहरा1 में कोई दरिया बहा देते
मुसाफ़िर को सराबों2 के फरेबों से बचा देते

कहेंगे शायरेनौ3 भी जमालीयात4 पर ग़ज़लें
पता होता तो ग़ालिब अपना दीवां ही जला देते

करें क

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ग़ज़ल

कागज़ों में बस चली है गाँव के इक रुट में
तब कहीं साहिब नज़र आये हैं मँहगे सूट में

सच खड़ा है ढीट बन, ये क्या तमाशा है मियाँ
नोट की ताकत मिला कर देखिये कुछ झूट में

शर्म आती है कि जगता ही नहीं उनका ज़मीर
एक हिस्सा जब तलक पाते रहें वो लूट में

देश अपनी चाल से च

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छोड़ कर चल दिए आज़माने के बाद
रो पड़ा आइना टूट जाने के बाद

बज़्म में अपनी मुझको बुलाने के बाद
चल दिए चार बातें सुनाने के बाद

कैसी फ़ितरत लिए लोग मिलते यहाँ
हाल पूछें मेरा घर जलाने के बाद

देख कर ग़ैर को बाम मलते हुए
आबले रो पड़े मुस्कुराने के बाद

लौट आई कफ़स

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आईने का मान

आईने का मान रखूँ
चेहरे पर मुस्कान रखूँ

राहगुज़र आसान रखूँ
मंज़िल पर ही ध्यान रखूँ

जग की भूल -भुलैयाँ में
अपनी कुछ पहचान रखूँ

क़र्ज़ अदा करना लाज़िम
क्यों उसका अहसान रखूँ

ख़ुद से यारी की शर्तें
मुश्किल या आसान रखूँ

मंज़िल दूर सफ़़र तनहा
कम से कम सामान रखूँ

पाँ

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