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*ग़ज़ल*


212 212 212 212

उनके चेहरे को तकता रहा देर तक ।
महवे हैरत रहा आईना देर तक ।।

उसने ज़ुल्फ़ें जो बिखरायीं बादल घिरे,
और बरसती रही फिर घटा देर तक ।

गुफ्तगू थी मोहब्बत के उनवान पर,
हम भी करते रहे तज़किरा देर तक ।

फांस लेगा शिकंजे में इक दिन तुम्ह

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उदासी छोड़ भी दे जो मुझे ...बेचैनियाँ तो हैं 
किसी की जुज़ तेरे भी .,,मुझ में यूँ  ..दिलचस्पियाँ तो हैं 

सिवा इक हिज्रे यारां कुछ मुझे मुश्किल नहीं लगता 
सुना है ज़िन्दगी में और भी ..दुश्वारियाँ तो हैं 

मेरे अशआर सारे कह न पाये कुछ कभी तुझ से 
मुख

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