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ग़ज़ल

चराग सारे बुझा रहा हूं,
हवा को रस्ता दिखा रहा हूं,
چراغ سارے بوجھ رہا ہوں،
ہوا کو رستا دیکھا رہا ہوں،
ये कैसी वहशत है मुझ पे तारी,
शरर को शबनम बता रहा हूं,
یہ کیسی وحشت ہے مجھ پر تاری،
شرر کو شبنم بتا رہا ہوں،
ये कैनवस भी चमक उठा है,
मैं तेरा चेहरा बना रहा हू

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ग़ज़ल

अब्र ने चाँद की हिफाज़त की
चाँद ने खुद भी खूब हिम्मत की

आज दरिया बहुत उदास लगा
एक कतरे ने फिर बग़ावत की

वो परिंदा हवा को छेड़ गया
उसने क्या खूब ये हिमाक़त की

वक़्त मुंसिफ़ है फ़ैसला देगा
अब ज़रूरत भी क्या अदालत की

धूप का दम निकल गया आख़िर
छांव होने लगी है शिद्दत की

सं

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ग़ज़ल

खुद से कुछ यूँ उबर रहे हैं हम
इक भंवर में उतर रहे हैं हम

ज़िन्दगी कौन जी रहा है यहां
मौत में जान भर रहे हैं हम

मौत के बाद ज़िन्दगी होगी
ये समझकर ही मर रहे हैं हम

अब संवरने का लुत्फ़ जाता रहा
आईने में बिखर रहे हैं हम

इश्क़ पहले भी तो हुआ है हमें
क्या नया है जो डर

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आसमां को चीर कर देखूँ न क्यों उस पार मैं
ख़्वाब को कैसे हक़ीक़त कह दूँ आख़िरकार मैं

ज़िन्दगी बाक़ी है, अपने अज़्म पर है ऐतबार
जीत की उम्मीद है तो मान लूँ क्यों हार मैं

बाप हूँ तो बेटियों की प्यास क्यों समझूँ नहीं
माँगकर गंगा को शिव से क्यों न दूँ उपहार मैं

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पिला कर दूध साँपों को तो पाला जा रहा है।
मगर छीना मेरे मुँह से निवाला जा रहा है।।
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किसी के हक़ में खुलती है अदालत रात में भी।
किसी का फ़ैसला बस कल पे टाला जा रहा है।।
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ग़ज़ल छेड़ो नयी कोई सुनाओ दास्ताँ कोई
मिलेगा आपके जैसा न मुझको मेहरबाँ कोई
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हमारे बाद भी चलती रहेगी दोस्तों दुनिया
न होंगे हम तो क्या होगा न रखना ये गुमाँ कोई
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ज़िन्दगी  का  सफ़र  रुका  ही नहीं
और   कितना  चले  पता  ही  नहीं
 
है  ख़ुदा ,पर  कभी  दिखा  ही नहीं
जब तलक मां है कुछ गिला ही नहीं
 
शक्ल अब  क्या है जानता ही नहीं
रू-ब -रू   मेरे   आइना   ही   नहीं
 
हैं  क़फ़न   जेब   के   बिना   सारे
आदमी  है   कि 
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रख ज़मीं पर पांव चल ना
बे सबब  ,बेजा  उछल ना
 
वक़्त  से भी तेज़  चल ना
भी ड़ से आगे निकल ना
 
रौशनी  की   जुस्तजू  है
मौम  के जैसे  पिघल ना
 
ज़ुल्म के  आगे  रहा चुप
गर्म  खूं  जैसे  उबल  ना
 
उम्रकी  फिसलन  बहुत है
देखकर चल ना सम्हल ना
 
कल गया तो
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डूबते  को  किनारा नहीं
एक तिनका सहारा नहीं
 
वक़्त से जंग है ज़िन्दगी
क्या कोई है जो हारा नहीं
 
वक़्त से ‌‌‌‌‌पिट गयी सूरतें
आइने  को  गवारा नहीं
 
मुंतज़िर हम रहे उम्र-भर
आपने  तो  पुकारा नहीं
 
कहकशां की तमन्ना लिए
नाम का एक सितारा नहीं
 
क़र्ज़ अहसान का था बहुत
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ग़ज़ल

गुलाब तोड़ने के शौक ऐसे पाले थे
लिबास ख़ार की हर नोक के हवाले थे

तुम्हारी राह में हरदम बिछाए फूल मगर
खुद अपने पांव से कांटे नहीं निकाले थे

लबों पे रहती थी मुस्कान आंखों में आँसूं
हमारे रोने के अंदाज़ भी निराले थे

तुम्हारी याद की छांवों ने हिज्र की ज

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ग़ज़ल 
वज़्न - 2122 1212 22
कितना आसान ये सफ़र होता।।
तू अगर मेरा राहबर होता।

होता खानाबदोश मैं भी नहीं।
और तू भी न दर बदर होता।।

हो भी जाता वज़ीर मैं शायद।
तू तो पक्का है ताजवर होता।।

मै ज़हां के फ़रेब खाता क्यों
तू अगर मेरा मो'तवर होता।।

मेरे टुकड़े भी काम आ

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1212 1122 1212 22
हम ऐसे लोगों से कब दिल बचाये रखते हैं।।
जो लोग खुद को मसीहा बनाये रखते हैं।

न जाने कौन दिया कब खिलाफ हो जाये।
हम आँधियों से भी रिश्ता बनाये रखते हैं।।

हमारे दिल में किसी रोज आ तू फुर्सत में।
हम अपने दिल मे तेरा घर बनाये रखते हैं।।

है जिनको

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ग़ज़ल (बह्र-हज़ज मुसद्दस महज़ूफ)

तेरी बातों में सच्चाई नहीं है।
कि मुझमें कुछ भी अच्छाई नहीं है।।

यकीं कैसे दिलायेगा तू ख़ुद को।
तेरा दिल मेरा शैदाई नहीं है।।

लगाता दोष क्यों तू आईने पर।
तेरे रूख़ पर ही रानाई नहीं।।

उजालों को दिया इल्ज़ाम तूने।
तेरी आंखों मे

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आँखों में है लाली क्या
बात गई है टाली क्या

तेरे दर से बढ़ कर हैं
ऊटी और मनाली क्या

वो गाली देता है गर
मैं भी दे दूँ गाली क्या

तर्क़ किया था तुमने कल
फिर शमशीर उठाली क्या

सीधा हूँ क्या जानूँ मैं
फर्जी है क्या जाली क्या

तेरी झूठी बातों पर
मैं भी बजाऊँ

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ग़मगीन थे जो पाँव में ज़ंज़ीर देखकर
ख़ुश हैं हमारे हाथ मे शमशी र देखकर

बदज़ह्नियत क़ुबूल नहीं थी हमें मगर
बदले हैं हम तो वक़्त की तासीर देखकर

देखे हसीन ख़्वाब कई मैंने इन दिनों
हैरान हूँ अब उनकी ही ताबीर देखकर

खमोश झील में कोई पत्थर न फेंक दे
शादां बचे हुब

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अँधेरे जो हम दिल में पाले रहेंगे
बहुत दूर हमसे उजाले रहेंगे
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कोई भी न देगा हमें हक़ हमारा
जुबाँ पर हमारी जो ताले रहेंगे
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हमें ढालिये मत ज़माने के रँग में
हमारे चलन तो निर

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सिर्फ़ हँस कर नहीं दिखाओ मुझे
जी रहे हो, यक़ीं दिलाओ मुझे

झूठ की उम्र कम ही होती है
हो भले तल्ख़ सच बताओ मुझे

तुम तो इतने करीब हो उसके
ज़िन्दगी से कभी मिलाओ मुझे

मेरे ख़त ही हैं ज़िन्दगी मेरी
ख़ुद ही जल जाएँगे जलाओ मुझे

दाम ख़ुद ही अदा न कर पाओ
क़ीमती इतना मत

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ज़िन्दगी तूने ही दी थी, ले के मेरा क्या लिया
ख़ुदकुशी का मुझसे नाहक़ फ़ैसला करवा लिया

बौखलाए इस क़दर उसकी तमाज़त से कि ख़ुद
अपने साये में ही हमने धूप को बैठा लिया

रेत को पानी बताने की ख़ता सहरा ने की
तो सराबों ने हमारी प्यास से बदला लिया

रुख़्सती पर जो लिखा थ

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तू कभी मिल जाये तो इस बात का चर्चा करूँ
हो गिला तुझसे ही तो किससे ख़ुदा शिकवा करूँ

हर सुतूं मिस्मार है अब इस हिसारे जिस्म का
रूह जाने को ही राज़ी है नहीं तो क्या करूँ

धूप के मासूम टुकड़ों की है मुझसे आरज़ू
साथ उनके जब रहूँ तो उनपे मैं छाया करूँ

झुर्रियाँ

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एक ग़ज़ल

ये दिल क्या चाहता है,
उसे सब कुछ पता है.

मैं कस के बांधता हूँ,
वो गांठें खोलता है.

ख़ता तेरी भुला दी,
मेरी बस ये ख़ता है.

सुनारों की तरह वो,
मुहब्बत तोलता है.

कभी होता है पानी,
कभी खूं खौलता है.

तेरा एहसास घर की,
फिजां में डोलता है.

मिला है चाँद को जो,
वही तुझको

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