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अब हम

ज़ुल्मो सितम ग़वारा अब हम नहीं करेंगे
इन्सानियत को पारा अब हम नहीं करेंगे

अफ़लाक़ से गिरे हैं हुक्मे उदूल होकर
ग़ल्ती वही दोबारा अब हम नहीं करेंगे

तालीम को परे कर हमने किया ख़सारा
ख़ुद को ही बेसहारा अब हम नहीं करेंगे

क़ौमों की क़िस्मतें हैं यकजाने हिक़्मो

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पतझर जब से

पतझर जब से ओढ़ लिया अमराई ने
सारे   पत्ते   जर्द   किये   पुरवाई   ने
 
ज़रा रोशनी   मेरे घर क्या झांक गयी
आंगन  में  दीवार  खड़ी की  भाई ने
 
अनाकुशी करने से मुझको रोक दिया
सिर्फ़ मुफ़लिसी की हिम्मतअफ़जाई ने
 
दरिया के उथलेपन का अहसास हुआ
बांह  पकड़  ली सागर
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Ghazal

सूखे फूलों को भी गुलदान में रक्खा हुआ है
शाहज़ादी ने हमें ध्यान में रक्खा हुआ है
سوکھے پھولوں کو بھی گلدان میں رکّھا ہوا ہے
شاہزادی نے ہمیں دھیان میں رکّھا ہوا ہے

हालते हिज्र पे तोहमत न लगा ऐ दुनिया
मैंने उस शख़्स को इम्कान में रक्खा हुआ है
حالت ہجر پے تہم

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ख़ुद उलझती है ख़ुद सुलझती है।
जिन्दगी इक अज़ब पहेली है।।

साथ तेरा मुझे मिला जबसे।
जिन्दगी मेरी मुस्कुराती है।।

सब्र करना व भूख से लड़ना।
मुफ़लिसी क्या नहीं सिखाती है।।

मैं बहुत चाहने लगा तुझको।
हर ग़ज़ल मेरी ये बताती है।।

बात कोई चुभे अगर दिल को।
तब ग़ज़ल ख़ुद मुझे बुल

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लज़्ज़ते वस्ल न अब दर्दे जुदाई मांगे,

ज़िन्दगी क़ैदे तमन्ना से रिहाई मांगे।

 

सर्दमेहरी के निशां सिर्फ़ दिलोजां पे नहीं,

ख़्वाब भी आंखों से पलकों की रज़ाई मांगे।

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न है अब शै कोई जो चैन छीने
यूँ मुत'अस्सिर किया है शायरी ने

समंदर से निकलने को है दरिया
किया आगाह आँखों की नमी ने

नही छूटे हैं उसके दाग अब तक
बहुत दिन चाँद को धोया नदी ने

चला हूँ धूप को मुट्ठी में ले कर
बहुत कर ली ठिठोली तीरगी ने

तुम्हारी नीमवा आँखों

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जो लोग ज़ी-हिस हैं उनके पीछे ही मसअले हैं
वो चैन से हैं जो आँख मूँदे पड़े हुए हैं
 
जफ़ा परस्तों को है मयस्सर सुकूँ की नींदें
वफ़ा की क़िस्मत में इज़तिरारी है, रतजगे हैं
 
सितम का सूरज अज़ल से झुलसा रहा है इनको
दरख़्त सब्र-ओ-रज़ा के फिर भी तने खड़े हैं
 
दिखावे का इख
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ख़्वाहिशों को जो मार रखते हैं
ज़ब्त पर इख़तियार रखते हैं
 
ये ज़रूरी नहीं लगें ग़मगीन
वो जो ग़म बेशुमार रखते हैं
 
इस तरक़्क़ी के दौर में भी जनाब
ख्व़ाब पर ऐतबार रखते हैं
 
रास्ता भूलते नहीं अपना
ये सितारे मदार रखते हैं
 
जब हो मिल्लत का मसअला दरपेश
हर अमल दरकिनार रखत
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ग़ज़ल

कोई पूछे तो इस दिवाने से
इश्क बढ़ता है आज़माने से
उसकी यादें हैँ दर्द का दरमाँ
दर्द बढ़ता है भूल जाने से
कोई सूरत निकाल मिलने की
ख्वाब ही में किसी बहाने से
तेरी यादों से घर चमकता है
रौशनी है ये दिल जलाने से
दमन ए यार पर कि आँखों में
काम अश्कों को है ठिकाने से
हैं

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आदमी तो आदमी है क्या हुआ गुमनाम है
है नहीं बदनाम, तो ला-इल्म या नाकाम है

बदचलन,बदरंग अब तो ये सियासत हो गयी
शोर भी उसका ज़ियादा जो हुआ नाकाम है

सोचिए,क्या एक मुद्दत को सज़ा हो जायगी
एक लमहा बे-अदब था बस यही इल्ज़ाम है

फूल हैं गुलदान में जितने सभी की है महक

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ग़ज़ल

शम्स पानी में जब......गिरा होगा
कितने साये.......बुझा गया होगा

आओ मिल बैठ कर सुलह कर लें
तोड़ कर राबिता भी....क्या होगा

पत्ती पत्ती है........सुर्खरू गुल की
फस्ल ए गुल ने..थपक दिया होगा

वक़्त का दश्त है............मुझे घेरे
मुझसे लम्हा........कोई गिरा

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ग़ज़ल

जीत कर भी फिर से हारी ज़िंदगी

पूछिए मत क्यूँ गुज़ारी ज़िंदगी

 

इक महाजन सब के ऊपर है खड़ा

जिस ने सब को दी उधारी ज़िंदगी

 

चुना कत्था लग रहा है आए दिन

पान बीड़ी और सुपारी ज़िंदगी

 

इक तरफ़ महमूद सा अंदाज़ है

इक तरफ़ मीना-कुमारी ज़िंदगी

 

हो गई है इस 'हनी' से बोर

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ग़ज़ल

 

उदू के हक़ में बोला जा रहा है
हमारा ग़म टटोला जा रहा है।।

नसीम ए सुब्ह कल होगी मुअत्तर
ज़रा सा इश्क़ घोला जा रहा है।।

अभी होगा यहीं सूरज पशेमाँ
सहर का राज़ खोला जा रहा है।।

सभी की ख्वाहिशें करते हो पूरी
हमें टाला-मटोला जा रहा है।।

कहानी से मिरा किरदार डस कर 

मज़े

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ग़ज़ल

अजब है इश्क बीमारी से बचिए
मुहब्बत में अदाकारी से बचिए ।

कहेगा क्या जमाना जानता हूँ ।
मग़र ख़्वाबों की बेगारी से बचिए।

सभी मतभेद सुलझाएंगे मिल के
मग़र अफवाह की आरी से बचिए ।

करो कुछ काम यारों मुफ़लिसों के
अजी सरकार मक्कारी से बचिए।

गिरेबां चाक हो जाएगा तेरा
निगा

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ग़ज़ल

एक  तेरी  जुस्तजू  के, जुस्तजू कोई नहीं
ज़िन्दगी से और मुझको आरज़ू कोई नहीं

तेरी आँखों के समन्दर में फ़क़त डूबा रहूँ
और  मेरी  आरज़ू-ए-गुफ़्तगू   कोई  नहीं

किस क़दर नश्शा है तेरी पुरकशिश आँखों में यार
तेरी  आँखों  सा ज़माने में सुबू कोई नहीं

वो  तेरा  नी

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ख़ुशी आँखों में आ कर ऐसे रोई
हँसा हो जैसे बरसों बाद कोई

पढ़े ही जा रही थी माँ की आँखें
बहुत मुश्किल से बेटी आज सोई

मनाएँगे नहीं कह कर गये वो
बहुत अच्छी लगी ये साफ़गोई

हिरासत से रिहाई पा गए तो
मेरे अश्कों ने अपनी ज़ात खोई

क़ज़ा अब तू लगा मुझको किनारे
मेरे

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आसमां को छेद कर देखूँ न क्यों उस पार मैं
ख़्वाब को कैसे हक़ीक़त कह दूँ आख़िरकार मैं

ज़िन्दगी बाक़ी है, अपने अज़्म पर है ऐतबार
जीत की उम्मीद है तो मान लूँ क्यों हार मैं

बाप हूँ तो बेटियों की प्यास क्यों समझूँ नहीं
माँगकर गंगा को शिव से क्यों न दूँ उपहार मैं

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ग़ज़ल



काग़ज़ पर इक याद पुरानी लिखता हूँ
मैं भी अपनी  राम  कहानी  लिखता हूँ

कैसे  एक  नज़र  में उन  से इश्क़ हुआ
इस  बाबत  अपनी  हैरानी  लिखता हूँ

सब जिस को आँखों का पानी कहते हैं
मैं  उस  को  दरिया तूफ़ानी लिखता हूँ

मैं  माज़ी  में   जाता   हूँ  जितना  पीछे
उतन

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ग़ज़ल

 

याद  से  जाती  नहीं  वो  आतताई ज़िन्दगी
छः गुणा बारह की खोली में बिताई ज़िन्दगी

गुस्ल की ख़ातिर लगी लोगों की लम्बी लाइनें
और  फटे  पर्दे  से  करती  बेहयाई  ज़िन्दगी

एक मुर्ग़ा , एक बिल्ली , दस कबूतर साथ थे
मुफ़लिसी में भी मुआफ़िक थी पराई ज़िन्दगी

देख 

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ग़ज़ल

चराग सारे बुझा रहा हूं,
हवा को रस्ता दिखा रहा हूं,
چراغ سارے بوجھ رہا ہوں،
ہوا کو رستا دیکھا رہا ہوں،
ये कैसी वहशत है मुझ पे तारी,
शरर को शबनम बता रहा हूं,
یہ کیسی وحشت ہے مجھ پر تاری،
شرر کو شبنم بتا رہا ہوں،
ये कैनवस भी चमक उठा है,
मैं तेरा चेहरा बना रहा हू

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