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ग़ज़ल

 

छलनी क़दम क़दम पे है सीना पहाड़ का
दूभर किया है किसने ये जीना पहाड़ का

चमके है दूर से जो नगीना पहाड़ का
बनता है देखते ही क़रीना पहाड़ का

चढ़ने लगे हैं आप जो ज़ीना पहाड़ का
लगता है बैठ जाएगा सीना पहाड़ का

भाता अगर है आपको जीना पहाड़ का
लेकर कहाँ से आएँगे सी

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ग़ज़ल

तसव्वुर की ज़मीं पर हम नई फ़स्लें उगाएँगे
अक़ीदत से ,मुहब्बत से, वफ़ा के गुल खिलाएँगे

अगर फुर्सत मिली हम को किसी दिन बैठ कर तन्हा
सलीके से ख़यालों में तेरी यादें सजाएँगे

ज़रा ये भी तो सोचो ऐ शजर को काटने वालो
नशेमन किस जगह आख़िर परिंदे फिर बनाएँगे

ज़रा दुश्वारिय

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ग़ज़ल

  1. साथ उनके उजाले गये
    ग़म अँधेरों में पाले गये

    हक़ जो माँगा किसी ने कभी
    उसपे   पत्थर   उछाले  गये

    इल्म  तो  साथ  मेरे  रहा
    चोर, फिर क्या उठा ले गये

    थी  रक़ीबों  की  बारादरी
    बज़्म से हम निकाले गये

    आप सच बोलकर दफ़अतन
    साख  अपनी  बचा  ले  गये

    - पुष्पेन्द्र 'पुष्प'

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हो गया प्यार,मगर प्यार नहीं होना था
इतना भी हमको समझदार नहीं होना था

सामना करना महब्बत का बहुत मुश्किल है
प्यार तो ठीक था, इजहार नहीं होना था

रास्ते में पड़े पैसे उठा कर लाये हो?
आत्मा को यह स्वीकार नहीं होना था

जब बदन बीच में आया तो भटक ही गये हम,
इश्क क

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चमनज़ारों से निस्बत थी हमें भी
बहार-ए-नौ की चाहत थी हमें भी

उदासी की तरह थे बेकराँ हम
उभर जाने की आदत थी हमें भी

भला हो आपका जो हाथ खींचा
संभलने की ज़रूरत थी हमें भी

कभी ये शहर हमसे आश्ना था
मयस्सर तेरी क़ुर्बत थी हमें भी

तुम्हीं से इश्क़ तुमसे ही अदावत
ख़ुदा कितन

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ग़ज़ल

दर्द  के  मंज़र  दिखाई  पड़  रहे  हैं  आए दिन
ख़ूब  चश्म-ए-तर दिखाई पड़ रहे हैं आए दिन

कोई सोचो वज्ह क्या है,नस्ल-ए-नौ के हाथ में
इस  क़दर  पत्थर दिखाई पड़ रहे हैं आए दिन

दिन ब दिन कम हो रहा है एक दूजे पर यक़ीन
अम्न  के  खंडर  दिखाई  पड़  रहे हैं आए

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Ghazal

तेरे इश्क़ में भी दमख़म कभी था न है न होगा।
मुझे भी यक़ीन हमदम कभी था न है न होगा।


तेरी क्या मज़ाल है तू मेरे दिल के ज़ख़्म भर दे,
तेरे पास ऐसा मरहम कभी था न है न होगा।


बड़ी देर में मैं समझा तेरी बज़्म की हक़ीक़त,
यहाँ चाहतों का मौसम कभी था न है न होगा।


जो मैं खुद म

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ग़ज़ल

आज बाजार खरीदार पुराने निकले।
खोटे सिक्के हैं जो उनके वो चलाने निकले।।

अपनी ढपली वो लिये राग सुनाने निकले।
कुछ तमाशाई फ़क़त शोर मचाने निकले।।

ये जो जुगनू हैं ग़ज़ल के ही सयाने निकले। 
खाक हो जाएंगे सूरज को बुझाने निकले।

जिनका अब तक ही नहीं दुनिया

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ख़ुद सरे बाज़ार आया है, लगाओ बोलियाँ
आदमी का मोल ही क्या है, लगाओ बोलियाँ

मुफ़लिसों की आबरू की भी कोई कीमत मिले
पेट तो उनको भी भरना है, लगाओ बोलियाँ

चढ़ गयी है रौशनी सूरज की अब नीलाम पर
जुगनुओं मौका सुनहरा है, लगाओ बोलियाँ

शबनमी मासूम चेहरा नूर है शोखी भी ह

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ग़ज़ल

पयाम ए उल्फ़त कभी किसी का,मुझे मिलेगा
ग़मों में दुबका ख़ुशी का लम्हा मुझे मिलेगा
भले ही कितनी करूँ मैं कोशिश, मुझे पता है
मेरे मुताबिक न ये ज़माना, मुझे मिलेगा
मुझे भी रस्ता बुलन्दियों का दिखाएगा जो
कहीं चमकता कोई सितारा मुझे मिलेगा
शिफ़ा ए दिल के लिए दवा जो कर

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ग़ज़ल।

 

पत्थरों ने ठोकरें मारी सुनाई कौन देता
जालिमों की कैद से हमको रिहाई कौन देता

जो बयां कर पाए ऐसी रौश्नाई कौन देता
इल्म देता कौन हमको रहनुमाई कौन देता

वक्त के नासूर की कोई दवा होती नही फिर
ज़िन्दगी के दर्द से आखिर रिहाई कौन देता

दर भी किस का खटखटाते न्या

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है बारे हुस्न से बोझल शबाब नींद में है
सुरूर ख़ुद का है तारी शराब नींद में है

वो मेंरे ख़्वाब में लाएगा कौन सी खुशियाँ
ये वो सवाल है जिसका जवाब नींद में है

बस इस कलामे मुअत्तर ने ली है अँगड़ाई
अभी तो हुस्ने ग़ज़ल की किताब नींद में है

हसीन कितना है मंज़र इसे न

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ग़ज़ल

*ग़ज़ल*


अब जीत का या मात का होता नहीं असर
मुझ पे किसी भी बात का होता नहीं असर

बैठे रहें मचान बनाये मेरे लिये
अब तो ग़मों की घात का होता नहीं असर

रोशन हो सादगी से ही चेहरा अगर कोई
उस पर जवाहरात का होता नहीं असर

वो डूबता नहीं है निकलता है उस तरफ़
सूरज पे जैसे

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ग़ज़ल

दूर रहती भी कैसे दिलबर से
मिल गई है नदी समंदर से

कितना लगता भला वो बाहर से
आदमी जो बुरा है भीतर से

लाख धोका दिया लकीरों ने
कोई शिकवा नहीं मुक़द्दर से

हैं फलों से लदे शजर जितने
चोट खाते रहेंगे पत्थर से

अश्क ठहरे हुए हैं पलकों पर
लह्र सी उठ रही है अन्दर से

शह्र क

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ग़ज़ल

एक पुरानी गज़ल

सामने सच के चुप रहा हूँ मै
झूठ के साथ पर लडा हूँ मै

मुस्कराहट भले हो चेहरे पर
रूह से पर कहीं बुझा हूँ मैं

जाएगा दूर किस तरह मुझ से
दिल में उसके बसा हुया हूँ मैं

तुमने लाँघा नही जिसे अब तक
तेरे दिल का वो दायरा हूं मै

जलजले आंधियां सभी हैं साथ

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ग़ज़ल

ये किस तजस्सुस में चल रहा हूँ

मैं ज़िंदगी से बिछड़ गया हूँ

न जीतता हूँ, न हारता हूँ

मैं जंग ख़ुद ही से कर रहा हूँ

भटकते फिरते जहाँ मुसाफ़िर

मैं बीहड़ों का वो रास्ता हूँ

ये ख़ौफ़ कैसा समाया मन में

ख़ुद अपने साये से भागता हूँ

कोई तो मेरा भी हल निकाले

अजब सा उलझा सा मसअ

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गज़ल

कभी रोशनी है कभी तीरगी है
दो पहलू का जीवन यही ज़िन्दगी है

न मैं 'मैं' रहूँ तो न तू 'तू' रहें अब
बनें 'हम' हमारी इसी मे खुशी है

उड़ानें खुदा की मशीयत के सदके
तो छोटे से पंखों से चिड़िया उड़ी है

चला आ मसीहे उसे फिर बचा तू
निशाने पे हर सू ही औरत खड़ी है

नहीं कृष्ण

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ग़ज़ल

वक़्त रहते, वक़्त के साँचे में ढलना चाहिये
बेहतरी के वास्ते ख़ुद को बदलना चाहिए
भूख, बीमारी, ग़रीबी, तंग हाली, रोज़गार
इन सवालों का कोई तो हल निकलना चाहिए
कोई मज़हब हो कोई भी धर्म हो या जाति हो
हर किसी पर एक सा क़ानून चलना चाहिए
वंचितों को मुफ़्त शिक्षा देने का सं

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nagun

अब कोई सर नगूं नहीं मिलता
इसलिए अब सुकूं नहीं मिलता

अक़्स। देखे हैं आईने देखे
दोस्त अब हू बहू नहीं मिलता

साज़े ग़म है सलीक़ा जीने का
कोई ख़ुशरू ख़ुज़ूअ नहीं मिलता

सब के सब ही मफ़ाद परवर हैं
कोई बे आरज़ू नहीं मिलता

मुद्द।आ क्या कहें दुआओं में
क़ल्बे रू। को वु

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