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ग़ज़ल

जाम से रग़बत न रक्खें, तर्क मयखा़री करें।
यूँ अदा साकी़ से हम रस्म ए वफा़दारी करें।।

शमअ की लौ थरथरा के हो गयी खु़द ही धुआँ।
अब अंधेरे जब तलक जी चाहे सरदारी करें।।

वक़्त, मुमकिन है, बदल दे ये निजाम ए जि़न्दगी।
खु़शबुएं काँटों की भी इक दिन तरफ़दारी करें।।

पेश खे़मा हैं किसी तूफाँ का ये खा़मोशियाँ।
अब सफी़ने डूबने की खु़द ही तैयारी करें।।

अब के सहरा की जबीं पर ये हवा ने लिख दिया।
ज़र्द पत्ते मौसमों की नाज़बरदारी करें।।

उसकी मर्जी़ से है साँसों का ये 'मीना' सिलसिला।
वो कहे तो जि़न्दगी से दस्त बरदारी करें।।


मीना नक़वी।

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Comments

  • जाम से रग़बत न रक्खें....
    अब सफीने डूबने की ख़ुद ही तैयारी करें।
    उम्दा अशआर पर मुश्तमिल बेहतरीन ग़ज़ल की दिली मुबारकबाद।
    • हृदय-तल से आभार मोहतरम।
  • उम्दा ग़ज़ल
    • बहुत शुक्रिया
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