himkar shyam (1)

ग़ज़ल।

 

पत्थरों ने ठोकरें मारी सुनाई कौन देता
जालिमों की कैद से हमको रिहाई कौन देता

जो बयां कर पाए ऐसी रौश्नाई कौन देता
इल्म देता कौन हमको रहनुमाई कौन देता

वक्त के नासूर की कोई दवा होती नही फिर
ज़िन्दगी के दर्द से आखिर रिहाई कौन देता

दर भी किस का खटखटाते न्या

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