ग़ज़ल (3)

ग़ज़ल

 

पंख कतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

दुर्योधन हो या हो जयद्र्थ सबसे उसका नाता है
अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर

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ग़ज़ल

वक़्त रहते, वक़्त के साँचे में ढलना चाहिये
बेहतरी के वास्ते ख़ुद को बदलना चाहिए
भूख, बीमारी, ग़रीबी, तंग हाली, रोज़गार
इन सवालों का कोई तो हल निकलना चाहिए
कोई मज़हब हो कोई भी धर्म हो या जाति हो
हर किसी पर एक सा क़ानून चलना चाहिए
वंचितों को मुफ़्त शिक्षा देने का सं

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