मुसाफ़िर (1)

ग़ज़ल

ये किस तजस्सुस में चल रहा हूँ

मैं ज़िंदगी से बिछड़ गया हूँ

न जीतता हूँ, न हारता हूँ

मैं जंग ख़ुद ही से कर रहा हूँ

भटकते फिरते जहाँ मुसाफ़िर

मैं बीहड़ों का वो रास्ता हूँ

ये ख़ौफ़ कैसा समाया मन में

ख़ुद अपने साये से भागता हूँ

कोई तो मेरा भी हल निकाले

अजब सा उलझा सा मसअ

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