#ghazal (1)

ग़ज़ल

चराग सारे बुझा रहा हूं,
हवा को रस्ता दिखा रहा हूं,
چراغ سارے بوجھ رہا ہوں،
ہوا کو رستا دیکھا رہا ہوں،
ये कैसी वहशत है मुझ पे तारी,
शरर को शबनम बता रहा हूं,
یہ کیسی وحشت ہے مجھ پر تاری،
شرر کو شبنم بتا رہا ہوں،
ये कैनवस भी चमक उठा है,
मैं तेरा चेहरा बना रहा हू

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