Ghazal

मेरी एक ग़ज़ल :

वो मुझसे दूर है माना , मगर हर वक़्त मेरी है।
तसव्वुर में मिरे हर पल वो मेरे साथ होती है।

शब-ए-हिज्रां से डरते हो ,मुहब्बत क्या करोगे तुम?
फ़िराक़-ए-यार से यारों मुहब्बत और बढ़ती है।

अंधेरे रास्ते तुमको सतायेंगे बहुत लेकिन
जो तुम चलते गए इक रोशनी इसमें उभरती है।

बहुत ही पुरसुकूँ सी दिख रही है ये कली लेकिन
किसी तूफ़ान के डर से ये अंदर से सिहरती है।

अगर कल उसको जाना था तो अब तक जा चुका होगा
घड़ी को रोकने से क्या समय की चाल रुकती है?

मुझे मालूम है लेकिन कलैंडर को मैं क्या बदलूँ ?
मेरे दिन तो नहीं बदले , फ़क़त तारीख़ बदली है

सुनहरी रोशनी बाहर से अच्छी लग रही होगी
मगर ये आग है "सूफ़ी" जो अंदर से दहकती है।

शुभम् सूफ़ियाना "सूफ़ी"

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