Ghazal

Ghazal

तेरे इश्क़ में भी दमख़म कभी था न है न होगा।
मुझे भी यक़ीन हमदम कभी था न है न होगा।


तेरी क्या मज़ाल है तू मेरे दिल के ज़ख़्म भर दे,
तेरे पास ऐसा मरहम कभी था न है न होगा।


बड़ी देर में मैं समझा तेरी बज़्म की हक़ीक़त,
यहाँ चाहतों का मौसम कभी था न है न होगा।


जो मैं खुद में सोचता था मैंने खुद मिटा दिए हैं,
वो तसव्वुरात का ग़म कभी था न है न होगा।


यहाँ आ के मैं ने जाना तेरी बज़्म है ग़मों की,
यहाँ दिल्लगी का आलम कभी था न है न होगा।

©️®️मंजुल मयंक मिश्र 'मंज़र'

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Comments

  • बहुत उम्दा
    • बहुत बहुत शुक्रिया अजय अज्ञात साहब
  • वाह विप्रवर, बहुत पुरानी ग़ज़ल है। अच्छी है।
    • दिल से बहुत बहुत आभार आपका.. दादा
  • वाह वाह वाह वाह!
  • ये मेरी पहली पोस्ट है... कुछ कमी या ग़लती हो तो बताएँ अवश्य।
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