Filbadeeh Ghazal

कह सकें अपना जिसे ऐसा बचा कोई नहीं.

रहने का इस शहर में अब फायदा कोई नहीं..

 

इश्क़ ने छोड़ा है ऐसी राह पर लाकर मुझे.

दोस्त दुनिया में मेरा मेरे सिवा कोई नहीं.

 

गाँव जाकर उसके देखोगे करिश्मा ये भी एक.

चांद चेहरे हैं वहाँ सब सांवला कोई नहीं.

 

रुकवा के बाइक मुझे रस्ते में पीटा गुंडों ने.

लोग गुजरे तो मदद को पर रुका कोई नहीं.

 

पड़ गया था धूल सा कुछ आँख में आकर अभी.

यार सबब इन आंसुओं का दूसरा कोई नहीं.

 

गाँव की बूढ़ी वो काकी अलविदा क्या कह गई. 

आके पीपल पर जलाता अब दिया कोई नहीं.

 

उस पहाड़ी पर हुआ करता था इक मंदिर कभी.

अब वहाँ जाने का लेकिन रास्ता कोई नहीं.

 

दूसरे की गोद में रोने लगा जब माँ को देख.

माँ सिवा बच्चे को चुप करवा सका कोई नहीं.

 

इश्क़ के सहरा में "राही" चाहतों की प्यास में.

जान कितनों ने गंवा दी आकड़ा कोई नहीं.

 

Harish Raahi

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Comments

  • बहुत ख़ूब
    • तहे दिल से शुक्रिया आपका
  • बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने
    • आदरणीया हौसला अफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया आपका
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