Blogs ग़ज़ल (185)

ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

उजाले जो इठला के गाने लगे।
अंधेरे भी घबरा के जाने लगे।।

जो नक़्श ए क़दम ढूँढते थे मेरा।
मुझे रास्ता वो दिखाने लगे।।

सितारों से करनी पडी़ दोस्ती।
मुझे रतजगे जब सताने लगे।।

अभी तो कोई बात हमने न की।
उठे आप, और उठ के जाने लगे।।

ज़रा उम्र की ध

Read more…
Comments: 6

ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़जल

जब घिरी कश्ती मेरी वक्त ए सफ़र तूफ़ान में।
दे गया दरिया भी कुछ गिरदाब मुझको दान में।।

यूँ किताब-ए-इश्क़ की तहरीर यकसर मिट गयी।
तोली जाती है वफ़ा अब झूठ के मीज़ान में।।

मरतकज़ किरदार पर रहती है दुनिया की नज़र।
एक लम्हा चाहिये रुस्वाई के ए

Read more…
Comments: 2

बशर को ढाई आखर का अगर सद्ज्ञान हो जाए
वही गुरुग्रंथ गीता बाइबिल क़ुर्आन हो जाए

मजाज़ी औ हक़ीक़ी का अगर मीज़ान हो जाए
मेरा इज़हार यारों मीर का दीवान हो जाए

जला कर ख़ाक करना, कब्ल उसके ये दुआ देना
कि मेरा जिस्म सारा ख़ुद ब ख़ुद लोबान हो जाए

ख़ुदा को भूलने वाल

Read more…
Comments: 3

नीमवा आँखें तुम्हारी कह रही हैं वो कहानी
दरमियानी दूरियाँ जब कम हुई थीं नागहानी

मुब्तिला थी लौ दिये की साज़िशों में साथ तेरे
जो हमारी धड़कनों की कर रही थी तर्जुमानी

तेरे दिल की आहटें मुझको सुनाई दे रही थीं
और भरती जा रा रही थीं मेरे दिल में बदगुमानी

मैं

Read more…
Comments: 2

परछाई के कद से

परछांई के क़द से अपने क़द का अंदाज़ा मतकर
सूरज डूब रहा हो तो उस ओर कभी देखा मतकर

मेरे क़द से मेरी चादर मेल नहीं खाती या रब
क़द ही थोड़ा और बढ़ा दे चादर को छोटा मतकर

तनहाई का दर्द कभी भी बाॅट नहीं लेगा कोई
कभीआइने के आगे जाकर ख़ुदको तनहा मतकर

ख़ुश है तो ख़ु

Read more…
Comments: 0

यूँ तो तमाम लोग हमारे रक़ीब हैं हम क्यों पता करें कि वो किसके क़रीब हैं। पाला नहीं है हमनें कोई भी मुग़ालता, अपने सिवाय और यहाँ अंदलीब हैं। माँगी नहीं है आपसे इमदाद कोई भी, इज़्ज़त से पेश आइये, माना ग़रीब हैं। ये क्या हुआ कि आज हुए हैं वो अश्कबार, कह तो यह

Read more…
Comments: 0

वो मुन्तज़र भी है आश्ना क्या
वही ख़यालों में बस गया क्या

यही सफ़र की है इन्तिहा क्या
नहीं है आगे का रास्ता क्या

तुम्हारे अहसान से दबगया क्या
किसी को वह बेजुबाॅ लगा क्या

न देखा जिसने यूॅ देखकर भी
हुआ है वो इन्तिहा ख़फ़ा क्या

जो मेरी सूरत से मुन्क़बिज़

Read more…
Comments: 0

याद करते भी नहीं और न भुलाया जाए
रूठ जाएं तो उन्हें कैसे मनाया जाए

एक मुद्दत से निगाहों में बसी है सूरत
फिर कहाँ कोई नया ख्र्वाब बसाया जाए

आइना है कि तलब करता है पहली सूरत
वक़्त ठहरे तो वही अक्स दिखाया जाए

लाश किसकी है मेरी बस्ती में मालूम नहीं
दफ़्न कर

Read more…
Comments: 0
मशहूर क्या हुए कि वो मग़़रूर हो गये
अपनों से और ख़ुद सेबहुत दूर हो गये
 
जो ज़ख़्म दिये आपने रक्खे सम्हाल के 
गुज़रा जो वक़्त आख़िरश नासूर हो गये
 
कोशिश हजार की कि सम्हल जाए ज़िन्दगी 
लेकिन  तन्हा  सफ़र  था सो मंसूर हो गये
 
करता कहाॅ है वक़्त कभी माफ़  किसी
Read more…
Comments: 0

भाई को भाइयों से लड़ाया न कीजिए
दीवार आँगनों में उठाया न कीजिए
---------------------------------------------------
सम्मान जिस जगह न करे आपका कोई
ऐसी जगह तो भूल के जाया न कीजिए
---------------------------------------------------
रुकने का नाम आज न बरसात ले र

Read more…
Comments: 0

शम्स था जोकि

शम्स था जोकि सरपर खड़ा होगया
मेरा साया कहीं गुमशुदा होगया

एक रिश्ता था वोभी फ़ना होगया
उसको कुर्सी मिलीतो ख़ुदा होगया

तीरगी का असर इन्तिहा होगया
मेरा साया भी मुझसे जुदा होगया

उसने मेरी हक़ीक़त जता दी मुझे
यूँ लगा वो मिरा आइना होगया

मेरी माँ ने रखा हाथ सर पै

Read more…
Comments: 0

जब अंधेरे को

जब अँधेरे को बेहद गुमाँ होगया
एक जुगुनू से आलम रवाँ होगया

लौट आये वहीं, थे जहाँ से चले
उम्र-भर का सफर रायगाँ होगया

हम चले,तुम चले,ये चले,वो चले
एक मंज़िल थी सो कारवाँ होगया

दबगया,बोझ इतना था अहसान का
एक दिन ये हुआ बेजुबाँ होगया

हम अचानक ही ज़रदार क्या‌ होगये

Read more…
Comments: 0

ग़ज़ल -कुबूल है

1212 1212 1212 1212

शराब जब छलक पड़ी तो मयकशी कुबूल है ।
ऐ रिन्द मैकदे को तेरी तिश्नगी कुबूल है ।

नजर झुकी झुकी सी है हया की है ये इंतिहा ।
लबों पे जुम्बिशें लिए ये बेख़ुदी कुबूल है ।।

गुनाह आंख कर न दे हटा न इस तरह नकाब ।
जवां है धड़कने मेरी ये आशिकी क

Read more…
Comments: 0

बेबसी


तोड़ देती है सभी को कैसे हाए बेबसी
अश्क़ सब के ये बहाए दिल जलाए बेबसी

सरहदों पर लड़ रहे हैं जो वतन के वास्ते
फ़िक्र बनकर उनकी माँओं को जगाए बेबसी

यार जब से छोड़ कर तन्हा गया मुझको यहाँ
हिज्र के गुल बाग में हर दिन खिलाए बेबसी

कर्ज़ में डूबा हुआ मज़दूर आख़िर क्य

Read more…
Comments: 0

एक ग़ज़ल

फूल   से   ख़ार   से   ख़ाबों   से   बहुत   आगे  का।
मेरा   मज़मूं    है   सितारों    से   बहुत   आगे   का।

या तो मिल जाए मुझे अब किसी साहिल की पनाह,
या   तलातुम   हो   किनारो   से   बहुत   आगे  का।

इक   नई   पौध   वो   दे  देता  है   जब   मिट्टी  को,
पेड़   

Read more…
Comments: 1

दोहा ग़ज़ल

 

वो  महकी  शेफालियाँ,कम हो गईं जनाब,
वो अमुवा की डालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

हाय  पश्चिमी  होड़  में ,गुम देसी परिधान ,
वो हँसली वो बालियाँ,कम हो गईं जनाब।

 

मँहगाई  के  दौर  में , फीके  सब  त्योहार,
वो होली - दीवालियाँ ,कम हो गईं जनाब।

 

इस विकास की दौड़ में,

Read more…
Comments: 0

तेरी नज़रों से यूँ गिरे हैं हम
रेज़ा रेज़ा बिखर गए हैं हम

कभी मर्ज़ी से चलते फिरते थे
अब जहाँ रख दिया, रखे हैं हम

जो कभी तितलियाँ पकड़ता था
वो नहीं यार, दूसरे हैं हम

तज्रबे की तो कुछ करो वक्अत
माना कुछ कम पढ़े लिखे हैं हम

हम हैं तिनकों से भी गए गुज़रे
फिर जियें

Read more…
Comments: 14

मेरे जैसा एक मैं हूं दूसरा कोई नहीं
सब हक़ीक़त जानते हैं मानता कोई नहीं

एक मुद्दत बाद देखा आइना तो यूँ लगा
ग़ालिबन ये शख़्स मैं हूँ दूसरा कोई नहीं

ज़िन्दगी ने गुल खिलाए और बूढ़ा करदिया
सब नज़र के सामने है देखता कोई नहीं

गाँव तक पगडंडियों को खागयी पक्की सड़

Read more…
Comments: 1

बदन पर अब थकन तारी बहुत है,
ज़ईफ़ी  है,  तो     दुश्वारी  बहुत है।

मरज़ का म्यूज़ियम है जिस्म अब ये,
फ़ना  हों,   एक   बीमारी  बहुत   है।

जलाने  के   लिये   बस्ती  मुक़म्मल,
घृणा   की  एक  चिंगारी   बहुत  है।

वफ़ा  के  नाम पर हैं क्यों, सितम ये 
दिले-नाज़ुक  को  ला

Read more…
Comments: 0

tues day pgm

ग़ज़ल

जाम से रग़बत न रक्खें, तर्क मयखा़री करें।
यूँ अदा साकी़ से हम रस्म ए वफा़दारी करें।।

शमअ की लौ थरथरा के हो गयी खु़द ही धुआँ।
अब अंधेरे जब तलक जी चाहे सरदारी करें।।

वक़्त, मुमकिन है, बदल दे ये निजाम ए जि़न्दगी।
खु़शबुएं काँटों की भी इक दिन तरफ़दारी

Read more…
Comments: 4
RSS
Email me when there are new items in this category –

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा

Designed and managed by Shesh Dhar Tiwari for Sukhanvar International