Blogs ग़ज़ल (185)

आबला पा के लिए फूल बिछाने वाले
हम तुम्हें छोड़ के जन्नत भी न जाने वाले

मैं कहीं जी न उठूँ लम्स तुम्हारा पाकर
मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाले

तू जो कह दे तो ख़ताएँ वो दुबारा कर लूँ
जिनके अफ़साने नहीं होते सुनाने वाले

तेरी आँखों से निकल आये हमारे आँसू
वर्ना

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ग़ज़ल

 

मेरी उपस्थिति

वैसे तो बंदिशों के साये में हम पले हैं।
आँखों मे अब भी लेकिन , कुछ ख़्वाब मनचले हैं।।

आजा! कि तुझ को अपनी ,पलकों मे कैद कर लूँ।
मजबूरियाँ हैं कैसी, ये कैसे फा़सले हैं।।

दीवार-ओ-दर हैं सूने, मंज़र धुआँ धुआँ है।
बस्ती में दिल की शायद, जज़्बों

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आँखों से शाह के भी, आँसू निकालता है
वल्लाह देखिये क्या, ज़र्रे का हौसला है

कमज़ोर आदमी को, झुक कर उठाइये तो
दिल का हर इक मुदावा, इस मश्क़ में मिला है

आज़ाद मुश्किलों से, है कौन इस जहां में
इनका तो हल भी इनसे,होकर ही मिल सका है

हर राह की रही है, इक मुख़्तलि

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ग़ज़ल

 

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

साथ उसका मुझ को कल तक था मयस्सर--क्या हुआ।
सोचती रहती हूँ मैं मेरा मुक़द्दर --क्या हुआ।।

खु़शबयानी देख कर मैं आपकी हैरान हूँ ।
तीर वो अल्फा़ज़ के लहजे का खंजर --क्या हुआ।।

किस तरह एहसास ने पसपाई कर ली इख़्तियार ।
हो गया क्यों मुन्तशिर

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अदू को मो'तबर कर लूँ यही अरमान बाक़ी है
भले कमज़ोर है, दिल में यही तूफ़ान बाक़ी है

फलक पर दस्ताने कर चुका हूँ मैं रक़म अपनी
लिखा है अज़ सरे नौ सिर्फ़ इक उन्वान बाक़ी है

जहाँ थीं बस्तियाँ अब हैं वहाँ कंक्रीट के जंगल
रिहाइश के लिए बस शह्र इक वीरान बाक़ी है

मुक़द्दर

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तरही ग़ज़ल

थोडी़  देरी से मेरी उपस्थिति

बढी़ है और ताबानी हमारी।
कि सजदे में है पेशानी हमारी।।

मुसाफि़र है वो हर मंजि़ल का लेकिन।
बस इक है राह अंजानी हमारी।।

दिल-ओ-जाँ कर दिये कुर्बान तुम पर।
वफा़ तुम ने न पहचानी हमारी।।

समाअत में अभी तक गूँजता है।
कहा था तुम ने 'द

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2020 की पहली ग़ज़ल

2020 की पहली ग़ज़ल

ये भी मुमकिन है कि हमसे गुनाह हो जाये
ये भी मुमकिन है कि फिर भी निबाह हो जाये

ये भी मुमकिन है कि हो राह जानिबे मंज़िल
ये भी मुमकिन है कि मुश्किल ये राह हो जाये

ये भी मुमकिन है कि दोनों में प्यार हो ही नहीं
ये भी मुमकिन है ख़ुशी से निकाह

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ghazal

 

मेरी उस्थिति

हिजरत के परिंदों को जब याद ए शजर आई।
एक हूक उठी दिल में और आँख भी भर आई।।

तय कर न सका राही, किस सम्त चले आखि़र।
भटकी हुई मंजि़ल से जब राहगुज़र आई।।

फू़लों की तरह मेरे अफ़कार महक उट्ठे।
खु़शबू मेरे माजी़ की जब जेह् न में दर आई।।

जब जश्न ए बहारा

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

एक हाहाकार सा है धरती और पाताल में।
फिर भी है आकाश हर पल मस्त अपने हाल में।।

होशियारी ये मछेरे की नही कीजे यकीं।
मछलियाँ तो  ख़ु़द भी फ़ंस जाती हैं अक्सर जाल  में।।

हम हैं वाबस्ता सदा से शायरी से इस लिये।
गीत लिक्खे और गाये हम ने सुर और ताल म

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

ये नया दौर है, सच के हैं सिकन्दर झूठे।
झूठ का राज है, राजा के हैं लश्कर झूठे।।

दो घडी़ के लिये आया है, तो मालूम हुआ।
हम ने जो सदियों में बनाये ,जो, वो सब घर झूठे।।

हम को बख़्शेगा मुहब्बत के हसीं ताज महल।
लनतरानी है तेरी, दावे सरासर झूठे।।

हम क

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या और बड़ी सी चादर दे
या क़द मेरा छोटा कर दे

मुझको दे सारा ज़हर मगर
सबको अमृत की गागर दे

मैं तो बदतर का आदी हूँ
औरों को जीवन बेहतर दे

ख़्वाहिश है छू लूँ आसमान
मुझको तू सुरख़ाबी पर दे

जिनके ज़हनों में मंज़िल है
उनको रस्ता दे, रहबर दे

ग़म से है जिनका आज भरा
उनका कल

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ग़ज़ल

 

पंख कतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है
सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है

दुर्योधन हो या हो जयद्र्थ सबसे उसका नाता है
अब अपना गाँडीव उठाते ‘अर्जुन’ भी घबराता है

जब सन्नाटों का कोलाहल इक हद से बढ़ जाता है
तब कोई दीवाना शायर ग़ज़लें बुन कर

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ग़ज़ल

 

मैं लिखता नहीं हर्फ़-ए-सदाक़त के सिवा कुछ
सो मुझको मयस्सर नहीं वहशत के सिवा कुछ

जिसको  है  बदलते  हुए  हालात  का इलहाम
सूझेगा  भला  क्या  उसे दहशत के सिवा कुछ

हँसता   है    मेरी    दर्द - बयानी   पे   ज़माना
सो  पूछिए  मुझसे  मेरी  हालत  के सिवा कुछ

जो 

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न तो शोर है न ही ख़ामुशी, किसी गुंग की ये सदा है क्या
तू मेरे ख़ुदा मुझे ये बता, किसी और ढब की फ़ज़ा है क्या

कभी नागहां सरे राह भी मेरे रूबरू तू हुआ है क्या
तुझे फिर भी मान लूँ ज़िन्दगी, अब इसी में तेरी रज़ा है क्या

मैं ग़रीब हूँ तू अमीर है, मैं हूँ ग़मज़दा,

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति ग़ज़ल

 

नींद का जि़म्मा नहीं आँखों के काशानों पर।
फ़र्ज़ बेदारी का लाजि़म है शबिस्तानो पर।।

 

अपने लोगों से ही जब खाये हैं धोके हम ने।
अब भला कैसे भरोसा करें बेगानों पर।।

 

दश्त-ओ-सहरा में बगूलों ने किया रक्स-ए-तरब।
टूट कर आई जवानी जो बयाबानों प

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति

चटक गये सभी आईने एतबार के भी।
चला गया वो मेरी जि़न्दगी गुजा़र के भी।।

अना के खो़ल में लिपटे हुये मेरे दिल ने।
सुकून पाया उसे बे सदा पुकार के भी।।

न जाने कैसी अदावत थी तपते सूरज को।
कि फू़ल खिल नहीं पाया चमन सँवार के भी।।

बुलन्दियों से सफ़र करत

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हिन्दी रचना

मेरी उपस्थिति

नभ पे जिस क्षण आक्रोशित दामिनी हो जायेगी।
मेघ बरसेंगे गगन से जाह्नवी हो जायेगी।।

लेखनी से अवतरित होगी जो मन की भावना।
लिखते लिखते एक दिन कामायनी हो जायेगी।।

इतना कोलाहल है, इतनी चीत्कारेंं है कि बस।
भीड़ में अब आत्मा अन्तर्मुखी हो जायेगी।।

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति
ग़ज़ल

कोई तो हो जो मिरी रूह में उतर जाये।
अन्धेरी रात के पैकर में नूर भर जाये।।

वो अपने साये में मुझ को छुपा के रख लेगा।
शजर से धूप की चादर ज़रा उतर जाये।।

मैं उसके क़ुर्ब की खु़शबू को भर लूँ दामन में।
गुज़रते वक़्त कह दो ज़रा ठहर जाये।।

इक आरज

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

नमी ढूँढोगे सहरा में कहाँ तक।
नहीं मिलता समन्दर का निशाँ तक।।

अना ने ख़ुदकुशी कर ली है शायद।
गई है तिश्नगी आब-ए-रवाँ तक।।

यहाँ फ़ाकाकशी रायज है हर सू।
नहीं उठता मकानों से धुआँ तक।।

बहुत सन्नाटा था धड़कन में दिल की।
ख़मोशी आ गई है अब बयाँ

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ग़ज़ल

मेरी उपस्थिति..ग़ज़ल

हमने माना जि़न्दगी अच्छी नही
फि़र भी हरगिज़ खुदकुशी अच्छी नहीं।

ख़त्म कर दे आँख की बीनाई तक।
तेज़ इतनी रोशनी अच्छी नहीं।।

रख दो हर सू प्यार के रोशन चराग़।
जेह्न ओ दिल में तीरगी अच्छी नहीं।।

दिल में रख कर नफ़रतों के सिलसिले।
हम से यूँ वाब

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