Blogs ग़ज़ल (185)

ज़िन्दगी  का  सफ़र  रुका  ही नहीं
और   कितना  चले  पता  ही  नहीं
 
है  ख़ुदा ,पर  कभी  दिखा  ही नहीं
जब तलक मां है कुछ गिला ही नहीं
 
शक्ल अब  क्या है जानता ही नहीं
रू-ब -रू   मेरे   आइना   ही   नहीं
 
हैं  क़फ़न   जेब   के   बिना   सारे
आदमी  है   कि 
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रख ज़मीं पर पांव चल ना
बे सबब  ,बेजा  उछल ना
 
वक़्त  से भी तेज़  चल ना
भी ड़ से आगे निकल ना
 
रौशनी  की   जुस्तजू  है
मौम  के जैसे  पिघल ना
 
ज़ुल्म के  आगे  रहा चुप
गर्म  खूं  जैसे  उबल  ना
 
उम्रकी  फिसलन  बहुत है
देखकर चल ना सम्हल ना
 
कल गया तो
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ग़ज़ल

गुलाब तोड़ने के शौक ऐसे पाले थे
लिबास ख़ार की हर नोक के हवाले थे

तुम्हारी राह में हरदम बिछाए फूल मगर
खुद अपने पांव से कांटे नहीं निकाले थे

लबों पे रहती थी मुस्कान आंखों में आँसूं
हमारे रोने के अंदाज़ भी निराले थे

तुम्हारी याद की छांवों ने हिज्र की ज

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उदासी छोड़ भी दे जो मुझे ...बेचैनियाँ तो हैं 
किसी की जुज़ तेरे भी .,,मुझ में यूँ  ..दिलचस्पियाँ तो हैं 

सिवा इक हिज्रे यारां कुछ मुझे मुश्किल नहीं लगता 
सुना है ज़िन्दगी में और भी ..दुश्वारियाँ तो हैं 

मेरे अशआर सारे कह न पाये कुछ कभी तुझ से 
मुख

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