Blogs ग़ज़ल (185)

ग़ज़ल-(बह्र-रमल मुसम्मन मख़्बून महज़ूफ)

आज बाजार खरीदार पुराने निकले।
खोटे सिक्के हैं जो उनके वो चलाने निकले।।

अपनी ढपली वो लिये राग सुनाने निकले।
कुछ तमाशाई फ़क़त शोर मचाने निकले।।

ये जो जुगनू तो ग़जब के ही सयाने निकले।
जल के मर जाएंगे सूरज को बुझाने निक

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ग़ज़ल

सितम करो तुम या ज़ुल्म ढाओ, सहूंगा सब बेज़बान हूँ मैं।
मुझे सभी कहते अन्नदाता,किसान हूँ हाँ किसान हूँ मैं।।

कभी है सूखा कभी है बारिस, कभी है बिजली की ये कटौती।
कटे परों का मैं हूँ परिंदा, कि उसकी झूठी उड़ान हूँ मैं।।

कभी उठाई जो बात हक़ की,मिली हैं

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भाव की अभिव्यक्ति होती है सरल क्या
पढ़ रहे हो तुम मुखाकृति आज कल क्या

मिल गयी क्यों शक्ति इतनी दानवों को
पी लिया शिव ने निरर्थक ही गरल क्या

सृष्टि का हर एक मानव सोचता है
मृत्यु है संसार में सचमुच अटल क्या

चाँदनी का तरु तले अभिसार तम से
देखकर होता नहीं चंद

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ग़ज़ल
हम सरेबज़्म यूंँ गुफ़्तार नहीं कर सकते।
अपने रिश्ते को तो अख़बार नहीं कर सकते।।

रक्खा रोजा है हमारी भी तो इन आँखों ने ।
बिना दीदार के इफ्तार नहीं कर सकते।।

सिर्फ़ सीने को निशाना हैं बनाते हरदम।
पीठ पर हम तो कभी वार नहीं कर सकते।।

कोई सोया है तो हम उस

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ग़ज़ल -

ज़ेह्न में क़ैद किया तुझको तज़क्कुर* करके।
अब तो कर लेता हूँ दीदार तसव्वुर* करके।।
*( तज़क्कुर =स्मरण। तसव्वुर =कल्पना)*
जिंदगी रब ने अता की है मुहब्बत के लिए।
यूं न बरबाद इसे कर तू तनफ़्फ़ुर* करके।।
*(तनफ़्फ़ुर=नफ़रत)*
मैने तो फ़र्ज निभाया है समझ

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ग़ज़ल
करम तेरा ख़ुदा हम पर ये तेरी ही ख़ुदाई है।
तेरा दीदार नामुमकिन तभी तो मांँ बनाई है।।

बनाया है अगर वालिद को जन्नत का जो दरवाजा।
मगर पैरों तले मांँ के ये जन्नत भी बनाई है।।

कभी रातों में जब भी जाग कर मैं रोने लगता था।
तभी उठकर तुरत मांँ ने मुझे लोरी स

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ग़ज़ल

इनपे मरहम तू लगा और खुजाता क्यों है ।
जख़्म भरने भी दे नासूर बनाता क्यों है।।

अब जला तेरा मक़ां शोर मचाता क्यों है।
आग औरों के घरों में तू लगाता क्यों है ।।

ये सितम कम तो नहीं था कि तेरी कै़द में हैं।
डाल कर दाना परिंदों को लड़ाता क्यों है।।

जिनकी ता

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इस क़दर मज़बूर हो जाएँगे ये सोचा न था
हम तुम्हीं से दूर हो जाएँगे ये सोचा न था

लोग मिलते हैं बिछड़ते हैं तो मिलने के लिए
आप यूँ काफ़ूर हो जाएँगे ये सोचा न था

हाँ तुम्हें हम प्यार करते हैं ये सच तो है मगर
इस तरह मशहूर हो जाएँगे ये सोचा न था

प्यार में नश्श

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ग़ज़ल
दाग़ मोमिन मीर ओ ग़ालिब की दुआ लेता हूं मैं।
ख़ुद को कुछ अश्आर इनके जो सुना लेता हूं मैं।।

शाइरी है इक समंदर थाह ले सकता नहीं।
हाँ ज़रूर इतना तो है गोता लगा लेता हूं मैं।।

खूब है ये भी तरीका अब सँवरने के लिए।
रोज़ ही बस आईना ख़ुद को दिखा लेता हूं मैं

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ग़ज़ल

लोग हमको सही नहीं कहते।
इसलिए तो खरी नहीं कहते।।

जो चुभे तंज़ सा किसी दिल में ।
फिर इसे दिल्लगी नहीं कहते।।

काम औरों के जो नहीं आती।
हम उसे जिंदगी नहीं कहते।।

खिदमते-ख़ल्क़ भी इबादत है।
सिर्फ़ सजदों को ही नहीं कहते।।

बूंद दो बूंद से जो मिट जाये।
फिर इसे ति

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ग़ज़ल
इस वास्ते ही हमने बहुत दूर कर लिया।
इतना जो ख़ुद को आपने मग़रूर कर लिया।।

तुमने दिया जो जख़्म वो मंज़ूर कर लिया।
हमने कुरेद कर इसे नासूर कर लिया।।

देती ज़बां न साथ कदम भी बहक रहे।
ख़ुद को नशे में तुमने जो *मख़मूर कर लिया।।
*(मख़मूर =नशे में चूर।

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*बराये इस्लाह*
ग़ज़ल
कैसे कैसे या ख़ुदा तेरे करिश्मे देखे।
आदमी क़ैद तो आज़ाद परिंदे देखे।।

जानवर घूमते बेखौफ़ दिखे शहरों में।
और इंसान ही इंसान से डरते देखे ।।

*(अय ख़ुदा हुक्म अबाबील बजा लाती तेरा।
और अबराह के लश्कर भी कुचलते देखे।।)

वक़्त की मार तो कमज़

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माँ का ध्यान रहे जब उधड़े रिश्तों की तुरपाई पर
बहुएँ ख़ुश हो जाती हैं बस रोटी की गोलाई पर

ढोल गवार शूद्र पशु नारी ताड़न के अधिकारी क्यों
बाहर चर्चा छिड़ी हुई है तुलसी की चौपाई पर

दद्दा बोले ताड़न माने समुचित देख भाल करना
छोटका है शैतान, निशाना है उसका भौजाई

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ग़ज़ल
सर तो रखता है लेकिन सर पर दस्तार नहीं रखता।
यानी दुनिया में वो अपना कुछ मेयार नहीं रखता।।

गिरगिट जैसा रंग बदलना फितरत में उसकी शामिल।
एक मुकम्मल वो अपना कोई किरदार नहीं रखता।।

एहसान जता तो देता है वो अपने किये का औरों पर।
बस औरों के लिए वो ओठों पर

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ग़ज़ल 

कह रही आंख की खुमारी है।
जाग कर तुमने शब गुज़ारी है।।

शोर इतना किया है यादों ने।
नींद भी छीन ली हमारी है।।

गीत कोई नया सुना दीजै।
छा रही दिल पे सोग़वारी है।।

आंखें नम होठों पे तबस्सुम भी।
खूब कोशिश हुई तुम्हारी है।।

खूबसूरत नही हूं मैं फिर भी।
मेरी मां

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मुझे आप अगर आँख भर देखिएगा
तो चेहरे पे मेरे असर देखिएगा

भले बंद हो जाएँ साँसें हमारी
मगर वा हमेशा ही दर देखिएगा

दिखाएँगी बस आपका अक्स आँखें
ज़रा ग़ौर से आप अगर देखिएगा

भले मेरी बदहाली पर आप बदलें
मुझे तो यूँ ही उम्र भर देखिएगा

भले आज मेरे मुख़ालिफ़ खड़े ह

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ग़ज़ल

इतनी नवाज़िसों से मग़रूर-हो न जाऊं।
तेरे करम से मौला अब दूर हो न जाऊं।।

खंजर लिये फिरेंगे ये दोस्त ही मेरे सब ।
मुझको यही है डर अब मशहूर हो न जाऊं।।

तस्वीर तुम करीने से मेरी तो बनाते ।
इतना ही रंग भरना बेनूर हो न जाऊं।।

क्यों इतनी मय पिलाता है मुझको

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ग़ज़ल
अपने दिल के करीब हो कोई।
एक ऐसा हबीब हो कोई।।

जख़्म देकर लगाये ख़ुद मरहम।
ऐसा भी तो रकीब हो कोई।।

जो चमन पर लुटाये ज़ाँ अपनी।
ऐसी इक अंदलीब हो कोई।।

नप सके जिससे दूरियां दिल की।
ऐसी भी तो ज़रीब हो कोई।।

वह् म का जो इलाज करता हो।
एक ऐसा तबीब हो कोई।।

सीख

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ग़ज़ल

अपने अन्दर नाग के फन को कुचल कर बात कर

डस न ले तेरी ज़ुबां कुछ तो सँभल कर बात कर

 

कुछ तो तहज़ीबो-तमद्दुन में भी ढल कर बात कर

जोश में रख होश भीे मत यूँ उछल कर बात कर

 

अपनी तन्हाई की बाहों से निकल कर बात कर

ज़िंदगी की गोद में आकर मचल कर बात कर

 

ख़ामुशी की बर्

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ग़ज़ल
ज़िंदगी के इम्तिहानों से अगर जो डर गया।
मौत के आने से पहले ही वो समझो मर गया।।

ज़ह् र ये तनक़ीद का जिसने पिया शंकर हुआ।
अब करे तनक़ीद कोई वाह से दिल भर गया।।

राह की मुश्किल बताती फ़र्क हम दोनों में है ।
ज़ानिबे मंजिल बढ़ा मैं और तू अपने घर गया।।

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