चमनज़ारों से निस्बत थी हमें भी
बहार-ए-नौ की चाहत थी हमें भी

उदासी की तरह थे बेकराँ हम
उभर जाने की आदत थी हमें भी

भला हो आपका जो हाथ खींचा
संभलने की ज़रूरत थी हमें भी

कभी ये शहर हमसे आश्ना था
मयस्सर तेरी क़ुर्बत थी हमें भी

तुम्हीं से इश्क़ तुमसे ही अदावत
ख़ुदा कितनी सहूलत थी हमें भी

बदलने लग गई तर्ज़-ए-मोहब्बत
उन्हें भी ये शिकायत थी हमें भी

कभी ऐ इश्क़ तेरी जुस्तजू में
फ़ना होने की फ़ुर्सत थी हमें भी

 

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Comments

  • Beautiful ghazal ♥️♥️
  • Waaaahh.... waaaaah waaaah
    बहुत प्यारी ग़ज़ल है
  • अच्छी ग़ज़ल है। नाज़ साहब की नज़र से गुजरे तो और निखर जाएगी।
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