ग़ज़ल

ग़ज़ल

दर्द  के  मंज़र  दिखाई  पड़  रहे  हैं  आए दिन
ख़ूब  चश्म-ए-तर दिखाई पड़ रहे हैं आए दिन

कोई सोचो वज्ह क्या है,नस्ल-ए-नौ के हाथ में
इस  क़दर  पत्थर दिखाई पड़ रहे हैं आए दिन

दिन ब दिन कम हो रहा है एक दूजे पर यक़ीन
अम्न  के  खंडर  दिखाई  पड़  रहे हैं आए दिन

पैरहन  शफ़्फ़ाक़  है  जिनका उन्हीं की जेब में
ख़ूं  सने  ख़ंजर  दिखाई  पड़  रहे हैं आए दिन

कल तलक इक-आध जो दिखते थे अख़लाकी ज़वाल
"दीप" वो घर-घर दिखाई पड़ रहे  हैं आए दिन

भरत दीप

चश्म-ए-तर = आँसू भरी आँखें/ wet eyes
नस्ल-ए-नौ= नौजवान पीढ़ी/ new generation
पैरहन= कपड़े/ dress
शफ़्फ़ाक़ = चमकदार और झीना/bright and transparent
अख़लाक़ी ज़वाल= नैतिक पतन/ moral deterioration

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