ग़ज़ल।

ग़ज़ल।

 

पत्थरों ने ठोकरें मारी सुनाई कौन देता
जालिमों की कैद से हमको रिहाई कौन देता

जो बयां कर पाए ऐसी रौश्नाई कौन देता
इल्म देता कौन हमको रहनुमाई कौन देता

वक्त के नासूर की कोई दवा होती नही फिर
ज़िन्दगी के दर्द से आखिर रिहाई कौन देता

दर भी किस का खटखटाते न्याय किस से मांगते हम
मुफ्लिसी के दौर मे थे, पारसाई कौन देता

बीच की दीवार ऊँची उठ गयी परिवार मे जब
रम गये खुद मे सभी माँ को दिखाई कौन देता

गांव में तो दूध मक्खन की कमी होती नहीं थी
शह्र मे रहते अगर मक्खन मलाई कौन देता

चाव क्या पूरे करे जब पेट भर खाना न दे जो
कौन लाता चूडियां सुर्मा सलाई कौन देता

शह्र मे दिक्कत है पानी की लडें इक बूंद को लोग
एक दूजे को वहाँ सोचो रसाई कौन देता

सात फेरे ले लिए अपना बनाया उम्र भर को
सिर्फ चूडे के लिये 'निर्मल' कलाई कौन देता

E-mail me when people leave their comments –

You need to be a member of Sukhanvar International to add comments!

Join Sukhanvar International

Comments

  • अच्छी ग़ज़ल हुई है आदरणीया मतले के ऊला में रदीफ़ के निभने पर विचार कर रहा हूँ ।
  • वाह
  • लाजवाब बेहतरीन ग़ज़ल
This reply was deleted.

प्रयागराज - लखनऊ - कानपुर - नोएडा - नई दिल्ली - चंदौसी - मेरठ - साँईखेड़ा - इंदौर - भोपाल - जयपुर - आगरा

Designed and managed by Shesh Dhar Tiwari for Sukhanvar International