ग़ज़ल

*ग़ज़ल*


अब जीत का या मात का होता नहीं असर
मुझ पे किसी भी बात का होता नहीं असर

बैठे रहें मचान बनाये मेरे लिये
अब तो ग़मों की घात का होता नहीं असर

रोशन हो सादगी से ही चेहरा अगर कोई
उस पर जवाहरात का होता नहीं असर

वो डूबता नहीं है निकलता है उस तरफ़
सूरज पे जैसे रात का होता नहीं असर

ऐ चाँद तू ही उनको बुला दे न ख़्वाब में
मेरी गुज़ारिशात का होता नहीं असर

हर बार बदले रूह बदन का ही पैरहन
उस पर क़ज़ा हयात का होता नहीं असर

हमको 'सिफ़र' वफाओं का ऐसा सिला मिला
अब दिल पे हादसात का होता नहीं असर

#अंजलि 'सिफ़र'

 

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Comments

  • वो डूबता नहीं है निकलता है उस तरफ
    इस शेर में पर पुनः गौर कीजिए ।
    सादर
    • Comments must be clear.
  • वाह! वाह!
    बहुत ख़ूब!
  • वाहः वाहः उम्दा ग़ज़ल
  • बेहतरीन ग़ज़ल।
    पे को 2 पर लेना हो तो पर लिखना चाहिए।
    • जी दुरुस्त फ़रमाया आपने
      शुक्रिया
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